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सतविन्द्र कुमार राणा's Blog (136)

मिर्च कोई आग पर बोता है क्या- ग़ज़ल

2122 2122 212

मिर्च कोई आग पर बोता है क्या,
लोन-पानी ज़ख्म को धोता है क्या।

हो रहा जो अब भले होता है क्या,
कोई अपने आप को खोता है क्या।

बेबसी को तू हटा औज़ार बन,
इसका दामन थाम कर रोता है क्या।

इश्क़ करता, सब्ज़ धरती देख ले,
बीज इसका तू कभी बोता है क्या।

'बाल' चुप्पी साध लेना जुर्म पर,
जुर्म से खुद कम कभी होता है क्या।

लोन-नमक

मौलिक अप्रकाशित

Added by सतविन्द्र कुमार राणा on April 6, 2021 at 8:06pm — No Comments

हौसले से तीरगी मिट जाएगी

2122 2122 212

कौन कहता है खुशी मिट जाएगी?
हौसले से तीरगी मिट जाएगी।

है भरम बस धूल आँधी के समय,
शांत होते ही कमी मिट जाएगी।

चोर चोरी भी तो मिहनत से करे,
कर ले मिहनत, गंदगी मिट जाएगी।

एक होता दूसरे खातिर फिदा,
फिर कहा क्यों जिंदगी मिट जाएगी?

'बाल' कर अल्फ़ाज़ से तू दोस्ती,
तेरी तन्हा बेबसी मिट जाएगी।


मौलिक अप्रकाशित

Added by सतविन्द्र कुमार राणा on March 29, 2021 at 7:34am — 2 Comments

तेरे गम के निशानों को यहाँ पर कौन समझे

तेरे सच्चे बयानों को यहाँ पर कौन समझेगा,

तेरे गम के निशानों को यहाँ पर कौन समझेगा?

यहाँ महलों से होती हैं हमेशा बात की कोशिश,

बता कच्चे मकानों को यहाँ पर कौन समझेगा।

हुई है कीमती नफ़रत, बनी व्यापार का सौदा,

मुहब्बत के ठिकानों को यहाँ पर कौन समझेगा।

बदलते पक्ष ये झट-से, फिसलते एक बोटी पर,

अडिग रह लें, उन आनों को यहाँ पर कौन समझेगा।

जिन्होंने 'बाल' सोचा था करें कुछ देश की खातिर,

शहीदों को व जानों को यहाँ पर कौन…

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Added by सतविन्द्र कुमार राणा on March 26, 2021 at 11:02pm — 8 Comments

हर सफ़े का हिसाब बाकी है- ग़ज़ल

2122 1212 22/112

देख लीजे ज़नाब बाकी है,

हर सफ़े का हिसाब बाकी है।

जब तलक इंतिसाब बाकी है,

तब तलक इंतिहाब बाकी है।

बर्क़-ए-शम से मिच मिचाए क्यों,

आना जब आफ़ताब बाकी है?

चंद अल्फ़ाज पढ़ के रोते हो,

पढ़ना पूरी क़िताब बाकी है।

रौंदने वाले कर लिया पूरा,

अपना लेकिन ख़्वाब बाकी है।

'बाल' अच्छा कहाँ यूँ चल देना,

जब कि काफ़ी शराब बाकी है।

---

इंतिसाब: उठ खड़े होना।

इंतिहाब: लूटना,…

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Added by सतविन्द्र कुमार राणा on March 19, 2021 at 10:30pm — 3 Comments

खुद को पा लेने की घड़ी होगी- गजल

2122 1212 22

खुद को पा लेने की घड़ी होगी,

वो मयस्सर मुझे कभी होगी।

हाथ से हाथ को छू लेने से

दिल की सिलवट भी खुल गयी होगी।

याद लिपटी है उसकी चादर-सी,

देह लाज़िम मेरी तपी होगी।

उसके बिन मैं सँभल चुका हूँ अब,

मस्त उसकी भी कट रही होगी।

बोल ज्यादा मगर सभी मीठे,

आज भी वैसे बोलती होगी?

तब शरारत ढकी थी चुप्पी में,

आज भी उसको ढाँपती होगी।

दिल में कोई चुभन हुई मेरे,…

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Added by सतविन्द्र कुमार राणा on July 24, 2020 at 12:00am — 4 Comments

छोड़ दो काफ़ी सियासत हो गयी है

2122 2122 2122

.

जानते हैं तुम में ताकत हो गयी है,

और किस-किस पे ये आफत हो गयी है।

झूठ है जो, झूठ बिन कुछ भी नहीं, पर

अब जमाने में सदाक़त हो गयी है।

जब चमन का फूल होने का भरो दम,

क्यों चमन से ही अदावत हो गयी है?

जिस्म पर ठंडा लबादा, आग मुँह में,

जिसने रक्खे उसकी शुहरत हो गयी है।

कौम के अच्छे की खातिर काम हो अब,

छोड़ दो काफ़ी सियासत हो गयी है।

हर खुशी पर, मेरी बोलो तो भला क्यों,…

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Added by सतविन्द्र कुमार राणा on January 2, 2020 at 12:00pm — 14 Comments

तेरा होना मेरा सर्जन है

मैं बीज पड़ा तेरे आँगन में

तेरी आर्द्रता से अंकुरण है

ये तन पौध बना फिर देख बढ़ा

तेरा होना मेरा सर्जन है।

कल-कल बहती हैं नदियाँ तुझ पर

मीठे-मीठे गीत सुनातीं हैं

जीवन को सींच रही हैं पल-पल

हरियाली को लेकर आतीं हैं

नित चलती पथ पर ये बिना रुके

आगे को ही बढ़ती जातीं हैं

बाधाओं को पार करें कैसे

ऐसा सबको पाठ पढ़ातीं हैं।

फिर मीत सिंधु के जा साथ मिलें

दिख जाता क्या प्रेम समर्पण है?

ये तन पौध बना फिर देख बढ़ा…

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Added by सतविन्द्र कुमार राणा on November 2, 2019 at 11:00am — 2 Comments

नहीं अच्छा है यूँ मजबूर होना- ग़ज़ल

1222 1222 122
नहीं अच्छा है यूँ मजबूर होना
दिखो नजदीक लेकिन दूर होना।

कली का कुछ समय को ठीक है, पर
नहीं अच्छा चमन, मगरूर होना।

अँधेरों में उजालों को दे रस्ता
चिरागों का न थकना चूर होना

कोई कहता इसे वरदान है ये
खले लेकिन किसी को हूर होना।

अभी सूखा नहीं रख ले तसल्ली
दिखेगा ज़ख्म का नासूर होना।

कदम तो चूम लेगी जीत तेरे
है बाकी बस तुझे मंजूर होना।

मौलिक अप्रकाशित

Added by सतविन्द्र कुमार राणा on September 20, 2019 at 2:00pm — 2 Comments

पत्थरों पे हैं इल्ज़ाम झूठे सभी-गजल

212 212 212 212

अब नए फूल डालों पे आने लगे,

और' भ्रमर फिर ख़ुशी से हैं गाने लगे।

पत्थरों पे हैं इल्जाम झूठे सभी,

राही के ही कदम डगमगाने लगे।

रहबरी तीरगी की जो करते रहे,

अब वो सूरज को दीपक दिखाने लगे।

वादा वो ही किया जो था तुमने कहा,

घोषणा क्यों चुनावी बताने लगे।

जिनकी आँखों पे सबने भरोसा किया,

वक्त  आने पे सारे वो काने लगे।

भैंस बहरी नहीं सुन समझ लेगी सब,

बीन ये सोच कर फिर…

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Added by सतविन्द्र कुमार राणा on March 21, 2019 at 11:30am — 2 Comments

हम मानेंगे बात जो हमको प्यारी है- ग़ज़ल

22 22 22 22 22 2

नमक मसाले से बनती तरकारी है

सच मानों यह असली दुनियादारी है।

देख सलीका नकली बातें करने का

असली पर ही पड़ जाता कुछ भारी है।

छेदों से ही जिसकी है औक़ात यहाँ

छलनी ही समझाती, क्या खुद्दारी है?

होते हों कितने भी पहलू बातों के

हम समझेंगे जितनी अक्ल हमारी है।

तुम मानों जो तुमको अच्छा है लगता

हम मानेंगे बात जो हमको प्यारी है ।

आज लबादे में लिपटे अल्फ़ाज़ सभी

जिनको सुनना जनता की…

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Added by सतविन्द्र कुमार राणा on March 4, 2019 at 9:00am — 4 Comments

करो कुछ याद उनको जो गये हैं- ग़ज़ल

1222 1222 122

ये देखा और' सुना इस फरवरी में

बहकता दिल ज़रा इस फरवरी में।

किसी की कोशिशें कुछ काम आई

कोई जम कर पिटा इस फरवरी में।

दिखावे में ढली है जिंदगी बस

रहे सच से जुदा इस फरवरी में।

मुहब्बत को समेटा है पलों ने

हुआ ये क्या भला इस फरवरी में?

कहीं पर नेह की कोंपल भी फूटी

किसी का दिल जला इस फरवरी में।

करो कुछ याद उनको जो गये हैं

वतन पर जां लुटा इस फरवरी में।

मौलिक…

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Added by सतविन्द्र कुमार राणा on February 12, 2019 at 7:30pm — 2 Comments

नफरतों को छोड़ लगता- ग़ज़ल

ग़ज़ल

2122 2122 2122 212

नफरतों को छोड़ लगता पास चल कर आ गए

हो न कुर्सी दूर फिर, वो दल बदल कर आ गए।

जंगलों पे राज करने का जुनूँ जो सर चढ़ा

शेर जैसी शक्ल में गीदड़ भी ढल कर आ गए।

इश्क में देखो उन्होंने यूँ निभाई है वफ़ा

चाहने वाले के सारे ख़्वाब दल कर आ गए।

ठंड की जो चाह में उन तक गए ले मन-बदन

गुप्त शोलों में वो बस चुपचाप जल कर आ गए।

सामने कमजोर प्राणी उनको जो दिखने लगा

है गज़ब सारे शिकारी ही मचल कर आ…

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Added by सतविन्द्र कुमार राणा on January 27, 2019 at 6:30am — 8 Comments

रक्तसिक्त हाथ (लघुकथा)

*रक्तसिक्त हाथ* (लघुकथा)

हवालाती कैदी के रूप में तीसरा दिन। किसी से मुलाक़ात के लिए उसे भी पुकारा गया। मुलाकात कक्ष में पहुँचते ही सींखचों के पार एक मुस्कुराता चेहरा नज़र आया।

काजू कतली का डिब्बा आगे बढ़ाते हुए जिसने कहा, ''रजिस्ट्री हो गई साहब! मुँह मीठा करवाने आया हूँ।"

कुछ ही समय पहले जो बिलकुल अंजान था, वही चेहरा अहर्निशं अब उसकी आंखों और दिमाग़ में तैरता रहता है।

सत्यवीर भान का चेहरा। आज दूसरी बार इस चेहरे पर भयानक मुस्कुराहट देख पा रहा था। जिसे देखकर उसे स्मरण हो…

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Added by सतविन्द्र कुमार राणा on January 2, 2019 at 9:26am — 14 Comments

कुण्डलिया छन्द

कुण्डलिया

जन को ढलना चाहिए, मौसम के अनुकूल

संकट होगा स्वास्थ्य पर, अगर करेंगे भूल

अगर करेंगे भूल, बात यह सही विचारो

खान-पान औ वस्त्र, सही ऋतुशः ही धारो

सतविंदर व्यवहार, सही हो रख पक्का मन

तन इसके अनुरूप, नहीं मन मौसम हो जन!

2.

जय-जय जय-जय हे अरुण!, तुम आभा भंडार

मिलती तुमसे जब किरण, तब चालित संसार

तब चालित संसार, प्रेरणा बात तुम्हारी

ऊर्जा तुमसे देव, मही अम्बर ने धारी

सतविंदर हर श्वास, सतत चलता है निर्भय

युग-युग रहो…

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Added by सतविन्द्र कुमार राणा on December 24, 2018 at 7:00am — 8 Comments

कुण्डलियाँ

1

माना होता है समय, भाई रे बलवान

लेकिन उसको साध कर, बनते कई महान

बनते कई महान, विचारें इसकी महता

यह नदिया की धार, न जीवन उनका बहता

सतविंदर कह भाग्य, समय को ही क्यों जाना

नहीं सही भगवान, तुल्य यदि इसको माना।

2

होते तीन सही नकद, तेरह नहीं उधार

लेकिन साच्चा हो हृदय, पक्का हो व्यवहार

पक्का हो व्यवहार, तभी है दुनिया दारी

कभी पड़े जब भीड़, चले है तभी उधारी

सतविंदर छल पाल, व्यक्ति रिश्तों को खोते

उनका चलता कार्य, खरे जो मन के…

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Added by सतविन्द्र कुमार राणा on December 19, 2018 at 3:30pm — 4 Comments

हर ख़ुशी का इक ज़रीआ चाहिये- ग़ज़ल

2122 2122 212

हर ख़ुशी का इक ज़रीआ चाहिए

ठीक हो वह ध्यान पूरा चाहिए।

दर्द को भी झेलता है खेल में

दिल भी होना एक बच्चा चाहिए।

जान लेना राह को हाँ ठीक है

पर इरादा भी तो पक्का चाहिये।

टूट कर शीशा  जुड़ा है क्या कभी

टूट जाए तो न रोना चाहिए।

झूठ की बुनियाद पर है जो टिका

वो महल हमको तो कचरा चाहिए।

 विष वमन कर जो हवा दूषित करे

उस जुबाँ पर ठोस ताला चाहिए।

मौलिक एवं…

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Added by सतविन्द्र कुमार राणा on December 17, 2018 at 6:30am — 10 Comments

परिंदा जो गिरा, गिर कर उठा है-गजल

1222 1222 122

न जाने क्या हुई हमसे ख़ता है

हमारा यार जो हमसे खफ़ा है।

यूँ ही बदनाम हाकिम को हैं करते

यहाँ प्यादा भी जब जालिम बड़ा है।

जरा सींचो भरोसा तुम जड़ों में

शज़र रिश्तों का इन पर ही खड़ा है।

उसी ने छू लिया है आसमाँ को

परिंदा जो गिरा, गिर कर उठा है।

नहीं हमदर्द होता आदमी जो

सहारा गलतियों में दे रहा है।

अमा की रात में महताब आया

तुम आये तो हमे ऐसा लगा है।

मौलिक…

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Added by सतविन्द्र कुमार राणा on November 28, 2018 at 6:30pm — 10 Comments

सुना ठीक है सिरफिरा आदमी हूँ- ग़ज़ल

122 122 122 122

सुना ठीक है सिरफिरा आदमी हूँ

उसूलों का पाला हुआ आदमी हूँ।

हमेशा ही जिसने सही बेवफ़ाई

जमाने में वो बावफ़ा आदमी हूँ।

कि मौजें मुझे दूर खुद से करेंगी

अभी मैं भँवर में फँसा आदमी हूँ।

डिगायेगी कैसे मुझे कोई आफ़त

मैं चट्टान जैसा खड़ा आदमी हूँ।

रहा साथ जिसके जरूरत में अक्सर

कहा है उसी ने बुरा आदमी…

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Added by सतविन्द्र कुमार राणा on November 26, 2018 at 10:00am — 9 Comments

चन्द मुक्तक

कुछ मुक्तक

1.

आग सीने में मगर आँखों में पानी चाहिए

साथ गुस्से के मुहब्बत की रवानी चाहिए

हाथ सेवा भी करें और' उठ चलें ये वक्त पर

ज़ुल्मतों से जा भिड़े ऐसी जवानी चाहिए।

2.

शेर की औक़ात गीदड़ की कहानी देख लो

नब्ज में जमता नहीं किसका है पानी देख लो

दुम दबाना सीखता जो क्या करेगा वो भला

हौसले का नाम ही होता जवानी देख लो।

3.

समंदर भी गमों के पी जो जाएँ

बहुत ही ख़ास हैं जिनकी अदाएँ

कहाँ हैं मौन ये खामोशियाँ भी

ज़रा तू देख तो…

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Added by सतविन्द्र कुमार राणा on November 12, 2018 at 11:00pm — 6 Comments

किसी के इश्क में बिस्मिल हमारी बेबसी कब तक(गजल)

1222 1222 1222 1222

रहेगी इश्क में बिस्मिल हमारी बेबसी कब तक

हमारा टूटना कब तक और' उनकी दिल्लगी कब तक।

सिमटकर इक परिंदा जान अपनी दे ही बैठा है

शिकारी! तू पकड़ इस पे रखेगा यूँ कसी कब तक।

यहाँ लोमड़ बने बुद्धू, चले तरकीब गीदड़ की

चलेंगी और ये बातें बताओ बे तुकी कब तक। 

अवामी सोच बढ़ने पर असर झूठा हुआ इनका

ये जुमलों की अरे साहब!, लगेगी यूँ झड़ी कब तक।

बड़ा तूफ़ान आयेगा लगा…

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Added by सतविन्द्र कुमार राणा on November 11, 2018 at 10:30pm — 7 Comments

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