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फासला, मैं अमान करता।
आप का, अवधान करता।।
हो ख़फ़ा, आख़िर भला क्यों।
मान जा, अविगान करता।।। (अविगान= मतैक्य)

रात्रि सा, छाया तिमिर है।
चन्द्र का, अरमान करता।।

भज रहा, तेरी भजन हिय।
देख ना, गुणगान करता।।

सांस का, है क्या भरोसा।
जान जा, मैं बयान करता।।

प्राण ना, मिलने निकल दे।
पास आ, आह्वान करता।।

मौलिक अप्रकाशित

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Comment by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on September 2, 2015 at 11:30am
आदरणीय गिरिराज सर सादर प्रणाम्

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on September 2, 2015 at 10:42am

आदरणीय पंकज भाई , इस प्रस्तुति के लिये आपको हार्दिक बधाई ।

Comment by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on September 1, 2015 at 12:07am

आदरणीय समर कबीर साब सादर आभार। आप लोगों से मिलने वाली तारीफें प्रेरणा देती हैं

Comment by Samar kabeer on August 31, 2015 at 11:41pm
जनाब पंकज कुमार मिश्रा जी,आदाब,सुन्दर प्रस्तुति हेतु बधाई स्वीकार करें ।
Comment by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on August 31, 2015 at 2:34pm

आदरणीय मिथिलेश सरएक बार पुनः सादर अभिवादन


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on August 31, 2015 at 2:17pm

आदरणीय पंकज जी इस सुन्दर प्रस्तुति पर हार्दिक बधाई 

कृपया ध्यान दे...

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