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आज फिर इक सुहागन अभागन हुई

आवरण छोड़ कर तुम चले तो गये, आभरण आज उसका उतारा गया।

आज फिर इक सुहागन अभागन हुई, उसका सिन्दूर धुल के बहाया गया।।  

मयकदे से तुम्हारी लगन क्या लगी, देख ले ना गृहस्थी अगन में जली।

आचरण के असर से भले तुम गये, एक दुल्हन को बेवा बनाया गया।।  

कल्पना से परे चेतना से परे, जाने संसार में कौन से तुम गये।

हे भ्रमर किस सफर पर चले तुम गये, रंग तेरे सुमन का मिटाया गया।।  

कितने संताप आँखों के रस्ते बहे, कितने सपने सुलग कर भशम हो गये।

वेदना का असीमित खजाना सुनो, आज तेरे प्रियम को थमाया गया।।  

वो जो मासूम चेहरे तेरे वंश हैं, इस जगत में तुम्हारे जो ये अंश हैं।

उनकी आँखों में अब उम्र भर के लिये, इक उदासी का मौसम सजाया गया।

(अपनी बड़ी साली के दुःख में आँसूओं के साथ)

मौलिक अप्रकाशित 

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Comment by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on September 2, 2015 at 11:28am
आदरणीय सौरभ सर; ये रचना बस दर्द की अभिव्यक्ति है; आप सभी को सादर आभार और अभिवादन
Comment by JAWAHAR LAL SINGH on September 2, 2015 at 10:55am

संवेदना के सिवा क्या कहूं, समझ सकता हूँ, लेखनि में आंसू कितना बहाया गया!


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on August 31, 2015 at 11:09pm

जिन परिस्थितियों में इस रचना का सर्जन हुआ है वह स्पष्ट दिखता है, भाईपंकज मिश्र वात्स्यायनजी.  रचना के माध्यम से दिल का दर्द जैसे बहा चला आ रहा है. यह मंच भी आपकी वेदनाको समझता है.  यह भी स्पष्ट हो रहा है कि आपकी रिश्तेदारी में जो कुछ हुआ है वह शराब की बोतल से निकले काल के कारण ही हुआ है. आपके संवेदनशील हृदय ने जिस दर्द को शाब्दिक किया है, उस पर शुभकामनाएँ या बधाई देना असंवेदनशीलता का जघन्य पर्याय होगा. लेकिन रचनाकर्म पर कुछ कहना साहित्यकर्म का भाग है. सर्वोपरि, संभावनापूरित रचनाओं पर सार्थक बातें कहना पाठक का एक दायित्व भी है. 

आपकी इस ग़ज़लनुमा की सभी पंक्तियाँ (मिसरे) अनायास या सायास फ़ाइलुन फ़ाइलुन फ़ाइलुन फ़ाइलुन फ़ाइलुन फ़ाइलुन फ़ाइलुन फ़ाइलुन यानी फ़ाइलुन की आठ आवृतियों के वज़न में है.

आपने इसे निभाया भी है. यह एक श्लाघनीय प्रयास है. 

अन्य बातें आप अवश्य सीख जायेंगे, बशर्ते आप मंच पर उपलब्ध ग़ज़ल पर लेख पढ़ना शुरू करें. 

सधन्यवाद

Comment by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on August 31, 2015 at 7:51pm

आदरणीय शशि भंसाली जी सादर अभिवादन और हार्दिक आभार

Comment by shashi bansal goyal on August 31, 2015 at 7:22pm
एक संवेदनशील दुखी मन ही ऐसी रचना कर सकता है ।एक एक शब्द चुभता हुआ हृदय को भेदता हुआ है ।
Comment by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on August 30, 2015 at 10:42pm
धन्यवाद मित्र मनोज जी
Comment by मनोज अहसास on August 30, 2015 at 10:35pm
बहुत मार्मिक भावुक मर्मस्पर्शी
मैं आपके दुःख में शरीक हु मित्र
भगवान स्थिति को नियंत्रित और संचालित रखे ऎसी प्रार्थना है
सादर

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