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लघुकथा- रहस्य   

“ इसी व्यक्ति के साथ बापू गया था . यह कह रहा था कि हम खूब पैसे कमाएंगे . बापू ने भी कहा था कि समुद्र से खूब मछलियाँ पकडूँगा . फिर ढेर सारा पैसा ले कर आऊंगा.” कहते हुए मोहन ने फोटो इंस्पेक्टर को दिया, “ साहब ! मैं वापस समुद्र के किनारे गुब्बारे बेचने जा रहा हूँ. शायद बापू या ये व्यक्ति मिल जाए.” कहते हुए मोहन  जाने लगा तो इंस्पेक्टर ने कहा, “ बेटा ! इसे देख ले. ये कौन है ?”

क्षतविक्षत फोटो में अपने बापू की कमीज पहचान कर मोहन के चीख निकल गई, “ ये तो मेरा बापू है साहब. इसे क्या हुआ ? इस की छाती और गुर्दे पर ये कटे हुए के निशान क्यों है साहब ? ”

इंस्पेक्टर क्या जवाब देता, उसे भी पता नहीं था कि क्या हुआ, “ ये छोटीछोटी मछलियाँ पकड़ने गया था, पर लगता है इसे ही बड़ी मछलियों ने अपना शिकार बना लिया है.”

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०७/०८/०२१५ 

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Comment by Omprakash Kshatriya on August 10, 2015 at 8:23pm
आ प्रतिभा जी आप ने लघुकथा को समर्थन दिया , इस हेतु आप का शुक्रिया ।
Comment by pratibha pande on August 10, 2015 at 7:17pm
ऐसी बड़ी मछलियाँ सब जगह फ़ैली हैं ,सशक्त रचना बधाई आपको आदरणीय
Comment by Omprakash Kshatriya on August 10, 2015 at 5:45pm
आ तेज वीर जी आप की प्रतिक्रिया मुझे सम्बल प्रदान करती है । आभार आप का ।
Comment by Omprakash Kshatriya on August 10, 2015 at 5:42pm
आ मिथिलेश जी , लघुकथा पर आप की सधी हुई प्रतिक्रिया पा कर आनंद की अनुभूति हुई । आप के इस स्नेह के लिए आप का शुक्रिया ।
Comment by TEJ VEER SINGH on August 10, 2015 at 12:35pm

आदरणीय ओमप्रकाश जी, बहुत गंभीर विषय उठाया है आपने इस लघुकथा के माध्यम से!सुंदर रचना!हार्दिक बधाई!


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on August 10, 2015 at 12:21pm

आदरणीय ओमप्रकाश जी, बढ़िया लघुकथा हुई है. कथानक को बहुत ही सधे हुए तरीके से शाब्दिक किया है इस बेहतरीन प्रस्तुति पर हार्दिक बधाई 

कृपया ध्यान दे...

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