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कौन नहीं चोर (लघुकथा)

एक व्यक्ति का नौकर उसके रुपये चोरी करके चला गया|

दूसरे व्यक्ति ने कहा "जो बेईमानी और चोरी के रूपए से अपना घर बनाता है वो कभी सुखी नहीं रह सकता"

पहले ने चौंक कर दूसरे की तरफ देखा और व्याकुल होकर कहा, "नहीं, आजकल ऐसा तो नहीं होता"

(मौलिक और अप्रकाशित)

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Comment by Dr. Chandresh Kumar Chhatlani on July 26, 2015 at 2:35pm

रचना को पसंद करने और मेरा उत्साहवर्धन करने हेतु  मैं  हृदय  से  आप सभी सुधीजनों आभारी हूँ| 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on July 13, 2015 at 2:21pm

बढ़िया  लघु कथा चंद्रेश जी हार्दिक बधाई .

Comment by MUKESH SRIVASTAVA on July 13, 2015 at 12:25pm

waah waaah

Comment by Omprakash Kshatriya on July 13, 2015 at 9:19am

वाह  भाई   Chandresh Kumar Chhatlan जी , आप ने कम शब्दों में बेईमानी  का खाका खींच दिया. इस सटीक, सारगर्भित और कसी हुई लघुकथा के लिए इ\मेरी बधाई स्वीकार करे.

Comment by विनय कुमार on July 13, 2015 at 2:07am

आजकल ऐसा कहाँ होता है , बहुत उम्दा लघुकथा आदरणीय चंद्रेश जी । बधाई इस चुटीली लघुकथा के लिए ..


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on July 12, 2015 at 10:59pm

आदरणीय चंद्रेश जी एक बढ़िया लघुकथा की प्रस्तुति पर हार्दिक बधाई. ये भी है कि सामाजिक विसंगतियों पर आधारित लघुकथाएं अपनी सफलता के द्वार स्वयं ही खोल लेती है किन्तु यह भी है कि ऐसे कथानक आधारित लघुकथाएं वाचाल हो जाती है. आपने पंच लाइन को जिस चतुराई और सघनता से शाब्दिक किया है वह मुग्ध कर रहा है. यही चकित करती पंचलाइन लघुकथा का चरमोत्कर्ष पर अंत करते हुए इसे सफल बनाती है. 

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