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हर उर भरे रंग हर होली कर संग

हर उर भरे रंग हर होली कर संग 

(मधु गीति सं. १७३३, दि. २० मार्च, २०११) 

 

हर उर भरे रंग, हर होली कर संग;

प्रमुदित हुए अंग, सरगम में साष्टांग.

 

अभिनव लगे पुष्प, आनंदित चिर तुष्ट;

आलोकित हर दृष्टि, आंदोलित हर वृष्टि.

आभा उभर आयी, कान्ति निखर धायी;

आच्छादित हर प्राण, स्वछंदित हर त्राण.

 

शाश्वत सुधा मेखे, आभासित सुर देखे;

जग की जलन मेटे, ज्योति नित उर देखे.

हर रंग में रंग घोले, हर उर में सुर घोले;

'मधु' उर में उन्मीलित, प्रभु के सुर सब रंग.

 

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Comment

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Comment by GOPAL BAGHEL 'MADHU' on March 21, 2011 at 12:17am

प्रिय अरुण जी, 

 

आपको, परिवारीय जनों व ओपिन बुक्स ओंन लाइन परिवार को होली पर हार्दिक शुभ कामनाएं स्वीकार हों.

 

कविता पसंद करने के लिए शुक्रिया! प्रारम्भिक दो पंक्तियों में कुछ परिवर्तन करने की आवश्यकता प्रतीत होती है.

 

अनेक  रंगों के गुलालों सहित 

Comment by Abhinav Arun on March 20, 2011 at 6:24pm
अच्छी कसी हुई रचना | बधाई ! और होली मुबारक |

कृपया ध्यान दे...

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