इन अकेली वादियों में चले आये
(मधु गीति सं. १७१७, दि. १० मार्च, २०११)
इन अकेली वादियों में चले आये, भरा सुर आवादियों का छोड़ आये;
गान तुम निस्तब्धता का सुन हो पाये, तान नीरवता की तुम खोये सिहाये.
श्वेत हिम से ढकी वादी मुस्कराये, घाटियों में छिपी लीलाएं सुहायें;
सौम्य सरिता गुप्त हृद धारा बहाये, पक्षियों के कलरवों से रव को भाये.
दृवित द्रुम की सादगी से हो प्रफुल्लित, घास की जिंदादिली से हो तरंगित;
शून्य के नीले हृदय से हो प्रदीप्तित, बादलों के बदलते तेवर से हर्षित.
वादियों की अछूयी सांसों को छूकर, साधना रत शुष्क पुष्पों को परश कर;
राग उनके गहन हृदयों का हृदय भर, तान वायु की तरंगों की सुधाकर.
सृष्टि को दे सुर विहंगम चले आये, किये हृदयंगम प्रकृति का राग गाये;
ले तरन्नुम में ‘मधु’ को उर लगाये, वादियों के गान आवादी सुनाये.
रचयिता : गोपाल बघेल ‘मधु’
टोरोंटो, ओंटारियो, कनाडा.
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