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अनमनी आकुल अखिल की आस्थाएं

अनमनी आकुल अखिल की आस्थाएं

(मधु गीति सं. १७२५ , दि. १४ मार्च, २०११)

 

अनमनी आकुल अखिल की आस्थाएं, व्यवस्था की अवस्था का सुर सुधाएं;

चेतना भरकर व्यवस्थित विश्व करके, संतुलन औ साम्य को सुन्दर बनाएं.

 

दिए दोलन धरणि के हर एक अणु में, चींटियों के चलन से पृथ्वी हिलाएं;

आत्म शक्ति कर प्रतिष्ठित धर्म लाएं, भ्रात्रवत व्यवहार करके उर संवारें.

मात्र शक्ति भक्ति औ सेवा पिरोकर, सहजता से शून्य को उज्जवल बनाएं;

आचरण संचरण कर स्वस्थित सवल कर, दीनता की दिवारों को शीघ्र ढाएं.

 

अचल आलम्वन हृदय में नित बसाएं, विकलता की बूँद से विष्फोट लाएं;

सद्गति को गति दिये शाश्वत बनाएं, विलखते से जीव के हृद को सुधाएं.

चीत्कारों के सघन वातावरण में, सृष्टि उपकारों की है मन भेद ढाएं;

बनाकर वृह्माण्ड को ‘मधु’ की सरायें, सरसती प्रभु व्यवस्था में सुधा लाएं.

 

रचयिता : गोपाल बघेल ‘मधु’

टोरोंटो, ओंटारियो, कनाडा

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Comment by Abhinav Arun on April 4, 2011 at 9:42am
अच्छी विचारपरक रचना बधाई !

मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on April 4, 2011 at 9:36am

आत्म शक्ति कर प्रतिष्ठित धर्म लाएं, भ्रात्रवत व्यवहार करके उर संवारें.

मात्र शक्ति भक्ति औ सेवा पिरोकर, सहजता से शून्य को उज्जवल बनाएं;

 

बेहद खुबसूरत काव्यकृति हेतु बधाई

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