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अपने  वज़ूद  की  ख़बर   इस तरह  हम  देते हैं
मुट्ठी  में  रेत उठाकर  हम  हवा  में उड़ा देते हैं


क्या हुआ जो  इस  उम्र में  हम बे-समर हो गए
ये शज़र आज भी  गुज़री  बहारों  की हवा देते हैं


अब हंसी भी  लबों पे  पैबंद  सी  नज़र  आती हैं
जाने लोग आँखों में कैसे नमी को  छुपा  लेते हैं


रुख से चिलमन उठते ही नज़रें भी बहकने लगी
हम भी बेजुबानों की तरह पैमाने को उठा लेते हैं


जागते  रहे  तमाम  शब्  हम  उसके इंतज़ार में
बार बार  चरागों  को  हम जलने की सज़ा देते हैं 


सुशील सरना
मौलिक एवं अप्रकाशित

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Comment by Sushil Sarna on December 24, 2014 at 7:20pm

आदरणीय  vijay nikore  जी रचना पर आपकी स्नेहिल प्रशंसा का हार्दिक आभार ।

Comment by vijay nikore on December 23, 2014 at 3:52pm

बहुत ही सुन्दर रचना है। हार्दिक बधाई।

Comment by Sushil Sarna on December 23, 2014 at 11:18am

आदरणीय गिरिराज भंडारी  जी रचना पर आपकी आत्मीय  प्रशंसा का हार्दिक आभार । 

Comment by Sushil Sarna on December 23, 2014 at 11:17am

आदरणीय सोमेश कुमार जी रचना पर आपकी स्नेहिल प्रशंसा का हार्दिक आभार । 

Comment by Sushil Sarna on December 23, 2014 at 11:16am

आदरणीय शिज्जु शकूर जी रचना को आपने सराहा मेरे सृजन को मान दिया उसके लिए मैं आपका दिल से आभारी हूँ। 

Comment by Sushil Sarna on December 23, 2014 at 11:15am

आदरणीय डॉ गोपाल नरायन श्रीवास्तव जी आपके स्पष्टीकरण ने मेरी सृजनशीलता को जो मान दिया है उसके लिए मैं आपका दिल से आभारी हूँ। कृपया भविष्य में अपने अनुजों का ऐसे ही मार्गदर्शन करते रहें। बाकी हाँ मैं गीतिका छंद और ग़ज़ल को उसके नियमों के अनुसार लिखने का अवशय प्रयत्न करूंगा और इस दिशा में आप जैसे अग्रजों का सहयोग चाहूंगा। धन्यवाद। 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on December 23, 2014 at 8:42am

आदरणीय सुशील भाई , बढिया रचना हुई है , आपको दिली बधाइयाँ ।

Comment by somesh kumar on December 22, 2014 at 11:34pm

जो कुछ भी है सुंदर है और भावपूर्ण है और मैं भी अभी" फ्री वर्स " में ही दिलो-शुकून पता हूँ |


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on December 22, 2014 at 8:18pm

आदरणीय सुशील सर आपकी रचनाओं में प्रवाह तो रहता है भाव भी दिलकश होते हैं, इस रचना के लिये सादर बधाई, आपके और आदरणीय डॉ गोपाल नारायण सर के बीच कुछ अच्छी चर्चा हुई है।

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on December 22, 2014 at 6:10pm

आदरनीय  सरना जी

हिन्दी कीछंद विधा के अतिरिक्त भी कोई   गीतिका है इसका ज्ञान मुझे नहीं था i इस  गीतिका का मीटर  तो आपने दिया है पर इसका परिचय कहा उपलब्ध है ? मेरी जानकारी के लिये बताएं i फ्री वर्स वही है जिसे आप  स्वतंत्र लेखन कह रहे है उसमे कवि का अपना  मीटर चलता  है i आप अपनी कविता के प्रति आश्वस्त  रहे उसमे कोई कमी नहीं है i सादर i

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