For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

बेमजा यार सफर रोज नई राहों का

2122     112 2     1122    22

**
खार  हूँ  एक  ये  सोचा   है  सभी  ने मुझको
फूल के साथ  जो  देखा  है  सभी  ने  मुझको

**

बंद सदियों  से  पड़ा  था  मैं  किसी  कोने में
खत तेरा जान के  खोला  है सभी ने मुझको

**
भोर सा रास  तुझे  आज   मगर  आया क्यूँ
तम भरी  रात जो बोला  है  सभी ने मुझको

**
दाद  वैसे  तो   मिली  बात  बुरी भी  कह दी
बस तेरी  बात  पे  कोसा  है सभी ने मुझको

**
रूह  की  बात  किसे   यार  लगी  सौदों  की
सिर्फ तन से ही तो तोला है सभी ने मुझको

**
बंद  आहट  से  मेरी  रोज  हुआ  जो  यारब
फिर उसी  द्वार पे भेजा  है सभी ने मुझको

**
हाल  मेरा   जो  हुआ   है  ये  फकीरों  जैसा
हर गली गाँव  में   रोका  है सभी ने मुझको

**
बेमजा   यार   सफर   रोज   नई  राहों का
हर नये  मोड़  पे  टोका है  सभी ने मुझको

**                 **              **          **
(रचना - 10 मार्च 2009)
मौलिक और अप्रकाशित
लक्ष्मण धामी ‘मुसाफिर’

Views: 984

Comment

You need to be a member of Open Books Online to add comments!

Join Open Books Online

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on June 8, 2014 at 10:08am

आदरणीय भाई सौरभ जी , किसी भी रचना को आपकी स्नेह भरी प्रशंसा मिले इससे बड़ी बात और क्या हो सकती है . इसके लिए हार्दिक आभार . शुभ शुभ ...


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on June 7, 2014 at 4:38am

एक व्यवस्थित हुई ग़ज़ल के लिए ढेरों दाद कुबूल करें भाईजी. शुभ-शुभ

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on June 5, 2014 at 11:19am

आदरणीया  अनुपमा जी, गजल की प्रशंसा कर उत्साहवर्धन के लिए हार्दिक धन्यवाद स्वीकारें ।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on June 5, 2014 at 11:16am

आदरणीय बृजेश भाई जी, सर्वप्रथम गजल की प्रशंसा के लिए हार्दिक धन्यवाद । आपकी नाराजगी जायज है और सलाह भी कि टिप्पणियों का जवाज निरंतर देना चाहिए । इससे निश्चित तौर पर संवाद बनने  के साथ साथ बहुत कुछ सीखने को भी मिलता है । आपने अपनापन दिखाते हुए नाराजगी दिखाई, इस अपनेपन के अहसास से मन में खुशी हुई । मैं आप सहित सभी सुधीजनों से टिप्पणियों का प्रत्युत्तर समय पर न दे सकने के लिए क्षमा प्रार्थी हूं , कुछ निजी व्यस्तता और साथ ही इंटरनेट व्यवस्था की खराबी के कारण ऐसा हो गया । भविष्य मैं इस बात का ध्यान रखूंगा । आदरणीय शकील भाई की टिप्पणी का संज्ञान पहले ही ले लिया था । आपके द्वारा चिन्हित शेर में ‘ में ’ के बाद पे ’ टंकण की त्रुटि है । आपके स्नेह और मार्गदर्शन के लिए पुऩः हार्दिक धन्यवाद ।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on June 5, 2014 at 11:15am

आदरणीय भाई नरेंद्र सिह जी उत्साहवर्धन के लिए बहुत बहुत आभार ।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on June 5, 2014 at 11:14am

आदरणीय भाई अविनाश जी , उत्साहवर्धन एवं गजल की प्रशंसा के लिए हार्दिक धन्यवाद स्वीकारें।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on June 5, 2014 at 11:14am

आदरणीय भाई आशुतोष जी, सिलसिलेवार हर शेर पर टिप्पणी से उत्साहवर्धन करने के लिए हार्दिक धन्यवाद । आपने सही कहा कि आदरणीय शकील भाई की बात सही है । आशा है भविष्य में भी इसी प्रकार समालोचना कर मार्गदर्शन करते रहेंगे । आपका स्नेह मिलता रहे यही कामना है ।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on June 5, 2014 at 11:14am

आदरणीय भाई जितेन्द्र जी , आपको गजल अच्छी लगी और सराहना की इसके लिए हार्दिक धन्यवाद ।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on June 5, 2014 at 11:10am

आदरणीय भाई शिज्जू जी गजल की प्रशंसा के लिए हार्दिक धन्यवाद, साथ ही सलाग के लिए भी । आप और शकील भाई की सलाह उचित है । इंटरनेट की खराबी के कारण प्रत्युत्तर में विलम्ब के लिए क्षमा प्रार्थी हूं ।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on June 5, 2014 at 11:10am

आदरणीया बहन कुंती जी, गजल की प्रशंसा कर उत्साहवर्धन के लिए हार्दिक धन्यवाद स्वीकारें ।

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Activity

Manjeet kaur replied to Admin's discussion अति आवश्यक सूचना : कृपया अवश्य अवगत हों .....
"ओ बी ओ मंच से बहुत कुछ सीखने को मिला इसके बंद होने की खबर दुखद और पीड़ादाई लगी। अजय गुप्ता जी की…"
8 minutes ago
Manjeet kaur commented on धर्मेन्द्र कुमार सिंह's blog post रहना हो भारत में जिंदा, चुप रहिए (ग़ज़ल)
"धर्मेंद्र कुमार जी आज के मुश्किल दौर में इतना जिगरा ! यथार्थ और सटीक वर्णन के लिए बहुत बहुत बधाई"
22 minutes ago
Sushil Sarna posted a blog post

दोहा सप्तक. . . .मंच

दोहा सप्तक. . . . . मंचअभिनय करते मंच पर, माटी के किरदार ।जीवन की अनुभूतियाँ, करते वो साकार ।।यह जग…See More
2 hours ago
धर्मेन्द्र कुमार सिंह posted a blog post

रहना हो भारत में जिंदा, चुप रहिए (ग़ज़ल)

बह्र: 22 22 22 22 22 2 रहना हो भारत में जिंदा, चुप रहिएजंगल का कानून है पहला, चुप रहिएमँहगाई से…See More
6 hours ago
रोहित डोबरियाल "मल्हार" posted a blog post

दास्तां

एक हो दास्तां तो सुनाएं,लंबी है कहानी, फिर कभी।मिले थे जिस जगह इक उम्र पहले,वो धुंधली सी निशानी,…See More
6 hours ago
Awanish Dhar Dvivedi posted a blog post

समय

समय को दोष देना क्यूँ समय जीना सिखाता है समय की गति सुनिश्चित है समय ही तो विधाता है।। समय का खेल…See More
6 hours ago
धर्मेन्द्र कुमार सिंह commented on धर्मेन्द्र कुमार सिंह's blog post देश की बदक़िस्मती थी चार व्यापारी मिले (ग़ज़ल)
"बहुत बहुत शुक्रिया आदरणीय सौरभ जी"
7 hours ago
आशीष यादव replied to Admin's discussion अति आवश्यक सूचना : कृपया अवश्य अवगत हों .....
"उम्मीद है कि इस पटल से संबंधित कोई अच्छी खबर आएगी।"
13 hours ago

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on धर्मेन्द्र कुमार सिंह's blog post देश की बदक़िस्मती थी चार व्यापारी मिले (ग़ज़ल)
"इस सुंदर बुनावट और कहन पर आज नजर पड़ी, आदरणीय धर्मेन्द्र जी.  हार्दिक बधाई   "
Monday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' shared their blog post on Facebook
May 24
धर्मेन्द्र कुमार सिंह commented on धर्मेन्द्र कुमार सिंह's blog post देश की बदक़िस्मती थी चार व्यापारी मिले (ग़ज़ल)
"बहुत बहुत शुक्रिया आदरणीय Ravi Shukla जी"
May 24
धर्मेन्द्र कुमार सिंह commented on धर्मेन्द्र कुमार सिंह's blog post देवता चिल्लाने लगे हैं (कविता)
"बहुत बहुत शुक्रिया आदरणीय Ashok Kumar Raktale जी"
May 24

© 2026   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service