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लव चूमना गुलों के हैं आसाँ कहाँ भ्रमर

221   2122        222  1222

बीरान जिन्दगी में वो आयी बहारों सी

सहरा में तपते जैसे कोई आबशारों सी

लगती है इक ग़ज़ल की ही मानिंद वो मुझको

उसकी तो हर अदा ही हो जैसे अशारों सी

जुल्फों को जब गुलों से है उसने सजाया तो

मुझको लगी अदा ये यारों चाँद तारों सी

जब साथ साथ चलके भी वो दूर रहती है 

तब लगती इक नदी के ही वो दो किनारों सी

मौसम हसींन सर्द है गर हो गयी बारिश

होगी हसींन  सी कली वो बेकरारों सी

लव चूमना गुलों के हैं आसाँ कहाँ भ्रमर

खारों की फ़ौज ही खडी है पहरेदारों सी

जब चूर चूर वक़्त से लड़ते हुए थे हम

बांहों का हार ले खडी थी वो सहारों सी

उस नाजनी के हुस्न की चर्चा करूँ मैं क्या

गुल सी हसींन शोलों सी शबनम शरारों सी

खामोश रह के बोलने का जानती है फन

उसकी तमाम बात तो होती इशारों सी

 

मौलिक व अप्रकाशित 

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Comment by Dr Ashutosh Mishra on March 10, 2014 at 2:26pm

आदरणीय नीरज जी , केवल जी , जीतेन्द्र जी ..आप सभी का तहे दिल धन्यवाद ..सादर 

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on March 6, 2014 at 11:40pm

बहुत खुबसूरत गजल कही आपने आदरणीय डा. आशुतोष जी, हार्दिक बधाई स्व्वीकारें

Comment by केवल प्रसाद 'सत्यम' on March 6, 2014 at 9:02pm

आ0 आशुतोष भार्इ जी,  क्या बात है...! बहुत ही सुन्दर गजल कही है।  हार्दिक बधार्इ स्वीकारें।  सादर,

Comment by Neeraj Neer on March 6, 2014 at 7:26pm

बहुत खूब ग़ज़ल कही है 

खामोश रह के बोलने का जानती है फन

उसकी तमाम बात तो होती इशारों सी... क्या कहने .. बहुत सुन्दर.

Comment by annapurna bajpai on March 6, 2014 at 4:00pm

बेहद खूबसूरत गजल , बधाई आपको आ0 आशुतोष जी । 

Comment by Dr Ashutosh Mishra on March 6, 2014 at 2:54pm

आदरणीय वैद्यनाथ जी ..मेरी रचना आपको पसंद आयी आपके स्नेहिल शब्द मुझे नूतन श्रजन की उर्जा से लबरेज करते है सादर धन्यवाद के साथ 

Comment by Saarthi Baidyanath on March 6, 2014 at 1:37pm

बहुत बढ़िया ग़ज़ल हुई है आदरणीय ...लाजवाब |

जब साथ साथ चलके भी वो दूर रहती है 

तब लगती इक नदी के ही वो दो किनारों सी...क्या कहने !

Comment by Dr Ashutosh Mishra on March 6, 2014 at 12:58pm

आदरणीया मीना जी ..हौसला अफजाई के लिए तहे दिल धन्यवाद ..सादर 

Comment by Meena Pathak on March 5, 2014 at 9:56pm
Bahut khoob Badhai

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