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ढक दिया जाता है नकाब से चेहरा !

 Portrait of young beautiful happy indian bride with bright makeup and golden jewelry - stock photoClose-up portrait of the female face in blue sari. Vertical photo - stock photo

 

सजा औरत को देने में मज़ा  है  तेरा  ,
क़हर ढहाना, ज़फा करना जूनून है तेरा !

दर्द औरत का बयां हो न जाये चेहरे से ,
ढक दिया जाता है नकाब से  चेहरा  !

बहक न जाये औरत सुनकर बगावतों की खबर ,
उसे बचपन से बनाया जाता है बहरा !

करे न पार औरत हरगिज़ हया की चौखट ,
उम्रभर देता है मुस्तैद होकर मर्द पहरा !

मर्द की दुनिया में औरत होना है गुनाह ,
ज़ुल्म का सिलसिला आज तक नहीं ठहरा !

दर्द औरत के दिल का जान सकता है 'नूतन'
वही जो दिल में उतरकर देखे गहरा !!

      शिखा कौशिक 'नूतन '

"मौलिक व अप्रकाशित"

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Comment by केवल प्रसाद 'सत्यम' on April 2, 2013 at 7:18pm

आदरणीया, शिखा कौशिक‘नूतन‘ जी, अतिसुन्दर गजल ‘दर्द औरत के दिल का जान सकता है ‘नूतन‘
वही जो दिल में उतरकर देखे गहरा !! बधाई स्वीकारें।


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on April 2, 2013 at 2:54pm


 जी आदरणीय सौरभ जी आपकी बात से सहमत हूँ |


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on April 2, 2013 at 2:16pm

आदरणीया राजेशजी, आपने जिस संवेदना और संयत ढंग से अपनी बातें रखीं हैं वह वास्तव में आपके हृदय की गहराइयों को बयान करता है. यह सही है कि शिखाजी को एक अरसे पढ़ रहा हूँ. हर बार अभिभूत भी होता हूँ. लेकिन आप मंच के उदार वातावरण को मात्र सुनाने का माध्यम समझती हैं, यही सालता है. आप जितने दिनों से इस मंच पर हैं, अबतक ग़ज़ल की बारिकियों को आत्मसात कर अपनी कहन को तथ्यात्मक ऊँचाई दे चुकी होतीं. साहित्य के परिवेश ही नहीं सामान्य समाज को भी एक सही अगाहकर्ता सुलभ होता.
मेरे कहे को मान देने के लिए आपका हार्दिक आभार.


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on April 2, 2013 at 1:02pm
एक औरत के दर्दे बयानी का सलीका अच्छा  है और  इज़ाफा होता अगर ग़ज़ल का मुकम्मल जामा पहनाया होता आदरणीय सौरभ जी का आशय भी यही है प्रिय शिखा जी मैं अक्सर आपको पढ़ती रहती हूँ आपकी कलम में इक आग है जो सीधे दिल पर वार करती  है  ,हुनर है ग़ज़ल की दुनिया की सरताज बन सकती हो , शब्दों को उसके वजन ,नियमो में बाँध कर देखो क्या चमकती हैं आपकी रचनाएं ,बहरहाल इस प्रस्तुति पर दिल की गहराइयों से दाद देती हूँ ।
Comment by बृजेश नीरज on April 1, 2013 at 8:19pm

 इस सुन्दर रचना हेतु बधाई स्वीकारें!.

Comment by अरुन शर्मा 'अनन्त' on April 1, 2013 at 5:14pm

आदरेया शिखा जी मर्मस्पर्शी एवं ह्रदय स्पर्शी रचना है, महिलाओं के साथ घटित कटु सत्य को शब्दों के जरिये सुन्दरता से प्रस्तुत किया है आपने. जिस तरह से परिवर्तन हो रहा है अगर यूँ ही चलता रहा तो पतन अधिक दूर नहीं है. बहरहाल इस सुन्दर रचना हेतु हार्दिक बधाई स्वीकारें.

Comment by ram shiromani pathak on April 1, 2013 at 4:34pm

आदरणीया शिखा जी बहोत ही सुन्दर ...हार्दिक बधाई


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on April 1, 2013 at 3:26pm

अभिव्यक्ति के  लिये बधाई.  आपकी भावनाओं का सम्मान करते हुए आपकी रचनाओं में काव्य तत्व का आग्रही हूँ. कथ्य सटीक है.

शुभेच्छाएँ.. .

Comment by विजय मिश्र on April 1, 2013 at 1:57pm

बहुत सख्त है और ढँकने की बात को बहुत बेपर्दगी से बयाँ करती है , पढ़ने के बाद सोचने लगा -- यह जमीन के किसी हिस्से का सच है क्या ? लज्जत भरी है आपकी बातों में . असआर बुलंद है . शुक्रिया नूतनजी . 

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