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चाँद घुटनों पे पड़ा था
अम्बर की किनारी पे

शब-ए-काकुल मे
तरेड़ पड़ गयी थी
चांदनी की .......
"जैसे तेरी कोरी मांग,
मैंने अभी भरी नहीं "

माँ ने अंजल भर के तारो से
चरण-अमृत छिड़का हो
सारा आसमान जैसे सजाया हो
आरती की थाली की मानिंद
तेरा गृह-प्रवेश करने के लिए ....... !

.. पर इतना बड़ा आसमान
कैसे मेरे छोटे से घर मे समाता .....

" अच्छा होता मैं घर ही न बनाता"
मैं घर ही न बनाता ... !!

-----------------

(शब-ए-काकुल - बालों की रात, तरेड़ -- crack)

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Comment

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Comment by vikas rana janumanu 'fikr' on October 11, 2010 at 1:24pm
shashi bhayee

ghar bada ho ya ho kya fark padta hai,

dil mai jagah honi chahiye

apkaa shukriyaa , padhne ke liye :)
Comment by Shashi Ranjan Mishra on October 11, 2010 at 1:21pm
विकास भाई,

भाव प्रधान है, प्लाट सही है... बुनियाद सही मिली मगर ये मकां अधूरा सा लगा... जैसे बिना छत की दीवारें... और शायद ये मंशा रही हो कि पहले समा लूँ इसमें सारा आसमां फिर ऊपर से छत कि बंदोबस्ती कर देंगे...

फिर से चले आयेंगे यहीं शब्दों के मोती चुनते, क्या पता ये आशियाना बहुत बड़ा मिले...

आभार
शशि
Comment by vikas rana janumanu 'fikr' on October 10, 2010 at 12:59pm
baagi bhayee
जबरदस्त है विकास भाई, घर तो बनाना ही है और इतना बड़ा बनाना है जिसमे आसमान आसानी से प्रवेश कर जाय, शेष मैं नविन भैया की बात से सहमत हूँ , बात अधूरी है , जमीन भी खुबसूरत चुना है , आप एक कुशल कारीगर है , तो फिर देर किस बात की , घर बन जाने दीजिये , जय हो,

pranaam. aap mere liye sabse khaas hain :)
aur pahle hi bol diyaa hai, aapki har bata manunga, ab ye bola kyu n hai mujhe bhi nahi pata :)

shukriyaa aapko pasand aaya ...

nazm mai past ka khyaal hai,,

aur future ki baat jo aapne batayee hai
beshq aaisa hoga,,,, hoga kyaa bas ho chukaa hai bhayee

ye nazm bahut purani hai
tab ka sach hai

ab ka sach ......... bhi aapke samne le aaunga

:)

thank u :) for ur comment
Comment by vikas rana janumanu 'fikr' on October 10, 2010 at 12:57pm
Navin C. Chaturvedi

shahab adaab........!!

hmm adhoori baat ......... kaise hai ye nahi samjh pa raha huN, mere liye to baat poori hi hai .....
nazm .... ka akhir hi mere khyaal ka akhir hai .....

nazm ek mukammal thought hoti hai, jaisa mai maanta hun, aur nazm jitni kam shabdo mai ho utni behtar bhi. lekin hum jo kahnaa chahe woh kah pane mai safal ho....

fir bhi agar aap kuch idea deN.. ki isse aage badhaya ja sake ... to ye mere liye seekhne ki baat hogi ......... maine ye nazm kamskam 4 saal pahle likhi hai, naya likha yaha share nahi kar sakta

isliye agar aap sujhav deN to mehrbaani hogi..
seekha mera pahla maksad hai
aur narjgi ko mai bahut door faink aaya huN ......

:)

shukriyaa

मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on October 10, 2010 at 12:43pm
पर इतना बड़ा आसमान
कैसे मेरे छोटे से घर मे समाता .....

"अच्छा होता मैं घर ही न बनाता"
मैं घर ही न बनाता ... !!
जबरदस्त है विकास भाई, घर तो बनाना ही है और इतना बड़ा बनाना है जिसमे आसमान आसानी से प्रवेश कर जाय, शेष मैं नविन भैया की बात से सहमत हूँ , बात अधूरी है , जमीन भी खुबसूरत चुना है , आप एक कुशल कारीगर है , तो फिर देर किस बात की , घर बन जाने दीजिये , जय हो,

सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Rana Pratap Singh on October 10, 2010 at 8:47am
वाह!!! बेहतरीन भाव|

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