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अँधेरा 

कदम खुद ही चलते हैं 
अँधेरे के निशा ढूंढ़ने !
रोक न पायें जब खुद को,
हम अँधेरे को क्यों दोष दें !
उजाला हर किसी की ओढ़नी
हम अँधेरे को ही ओढ ले !
उजालों ने थकाया हमें 
निगाहों ने लुटाया हमें !
कदमो ने भी पकड़ी वही राह 
फिर रास्तों को हम क्यों दोष दें !
मुस्कुराता है वो चाँद भी 
अँधेरी ही राह पर !
फिर जगमगाते तारों को ,
हम क्यों दोष दें !.........
रचना राजेन्द्र सिंह कुँवर 'फरियादी'

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Comment

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Comment by राजेन्द्र सिंह कुँवर 'फरियादी' on August 7, 2012 at 3:39pm

सभी मित्रों का हार्दिक आभार आप लोगों से ही ये प्रेरणा मिलती है मुझे ...........आशा है आप सब मित्रों का स्नेह और अश्रीवाद मेरे ऊपर बना रहेगा |

Comment by अरुन 'अनन्त' on August 5, 2012 at 3:16pm

बहुत खूब अति सुन्दर

Comment by SURENDRA KUMAR SHUKLA BHRAMAR on August 5, 2012 at 12:52am

मुस्कुराता है वो चाँद भी 

अँधेरी ही राह पर !
फिर जगमगाते तारों को ,
हम क्यों दोष दें !.........
फरियादी भाई बहुत सुन्दर रचना ..सच में उसे हम क्यों दोष दें आइये खुद सोचें समझें और सुधरें ..जय श्री राधे .....भ्रमर ५ 
Comment by संदीप द्विवेदी 'वाहिद काशीवासी' on August 4, 2012 at 5:34pm

वाह सुन्दर भावपूर्ण रचना! बधाई राजेंद्र भाई..!!

Comment by Rekha Joshi on August 4, 2012 at 1:39pm

मुस्कुराता है वो चाँद भी 

अँधेरी ही राह पर !
फिर जगमगाते तारों को ,
हम क्यों दोष दें !.........अति सुंदर अभिव्यक्ति ,बधाई 

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