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राज़ नवादवी: मेरी डायरी के पन्ने- १६

मैं अपने प्यार को तो न समझा पाया....

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मैं अपने प्यार को तो न समझा पाया, तेरे गुनाहगार को तो समझा लूँ. मैं अपनी तकदीर न बना पाया, तेरे अरमानों को तो सजा लूं. मैं चाह कर भी न बन पाया तेरा साया, मैं तेरा आशना होने का वहम तो मिटा लूं. मैंने तेरे वास्ते अग्यार को भी समझाया, थोड़ी देर दिलेनादाँ को ही समझा लूं. हालात ने चाहतों को बहुत बहकाया, अपनी नाकाम उम्मीदों को तो झुठला लूं. चलो आज भी तुम नहीं आए छत पे, मैं अपनी उदासियों कोई गीत ही सुना लूं. ऐ मेरे गाँव की मिट्टी, धूल, और हवाओं, आओ तुम्हें उसकी याद में अपनी मुट्ठी में उड़ा लूं. और ऐ आम के बगीचे के पुरसुकून साये, तुझसे न लौट के आने वाले की खुशबू का पता लूं. तू मुझे कोई फैसला तो सुनाए, कि मैं जिसे अपनी तकदीर बना लूं. मैंने चाहा तो बहुत कि जो बातें तुझे नागवार है वो बातें अपने आप से भी छुपा लूं.

 

कुछ करने न करने, कुछ होने न होने, कुछ कहने न कहने की कशमकश में ये ज़िंदगी यूँ ही गुज़रती रही. दिल को ये हैरत है कि अब भी यही सोचता हूँ कि तेरे न मिलने की सूरत में मैं कैसी शिफा लूं, और किसकी दुआ लूं!     

 

© राज़ नवादवी

पुणे, २६/०४/२०१२ 

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