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ग़ज़ल नूर की- चाहें किसी को और निबाहें किसी से हम

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221 2121 1221 212 


चाहें किसी को और निबाहें किसी से हम
ख़ुश होईये कि हो ही गए आदमी से हम.
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वो आते इस से क़ब्ल दवा काम कर गई
उकता गए हकीम की चारागरी से हम.
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दीवार पर लगी हुई तस्वीर है अना
पीछे से झाँकती हुई इक छिपकली से हम.  
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बन्दों में और ख़ुदा में अजब घालमेल है
हम से ही वो बना है, बने हैं उसी से हम.
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सूरज नहीं हैं हम जो किसी रात से डरें
लड़ते रहेंगे सुब्ह तलक तीरगी से हम.
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दुनिया की दौड़ में यूँ पिछड़ते चले गए
आगे निकल न पाए जो अपनी घड़ी से हम.
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निलेश 'नूर'
मौलिक/ अप्रकाशित 

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Comment

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Comment by Nilesh Shevgaonkar on July 5, 2023 at 2:30pm

आदरणीय सौरभ सर,

आप के इस ग़ज़ल तक आ कर टिप्पणी करने हेतु आभार।

दाद के लिए धन्यवाद।

मैं शाम तक मात्राक्रम लिख कर edit करने प्रेषित करता हूं।

सादर

 


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on July 4, 2023 at 2:00pm

वाह ! बहुत खूब आदरणीय नीलेश जी. शेर दर शेर दाद कुबूल फरमाएँ 

ओबीओ की परम्परा के अनुसार बहर की मात्रिकता को प्रस्तुत कर देना था. 

पुनः हार्दिक बधाइयाँ 

Comment by Nilesh Shevgaonkar on June 29, 2023 at 11:08am

बहुत बहुत आभार आ. लक्ष्मण जी 

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on June 29, 2023 at 6:32am

आ. भाई नीलेश जी सादर अभिवादन। बेहतरीन गजल हुई है। हार्दिक बधाई।

Comment by Nilesh Shevgaonkar on June 28, 2023 at 5:52pm

शुक्रिया आ. रवि जी,,, आपने भी ठीक जगह ऊँगली रखी...
आभार 

Comment by Ravi Shukla on June 28, 2023 at 5:39pm

वाह वाह आदरणीय नीलेश जी बहुत ख़ुब ग़ज़ल कही है एक से बढ़कर एक शेर हुए है । तीसरा शेर खास तौर पर पसंद आाया । इस उम्दा गजल पर शेर दर शेर मुबारक कबाद कुबूल करे । सादर 

कृपया ध्यान दे...

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