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गिरगिटी रंगबाज़ी की आदत तेरी----- ग़ज़ल

212 212 212 212

जब कभी दर्द हद से गुज़रने लगा
शाइरी का हुनर तब निखरने लगा

ज़ख़्म जब भी लगा दिल से दरिया कोई
हर्फ़ बन कागज़ों पर बिखरने लगा

तन के भीतर जो उस आइने में उतर
कौन ऐसा है जो अब सँवरने लगा

बेवफ़ाई का ऐसा हुआ है असर
एक सन्नाटा दिल में पसरने लगा

रँग बदलने की आदत तेरी गिरगिटी 
सो जहाँ तू नज़र से उतरने लगा

मौलिक अप्रकाशित

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Comment

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Comment by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on April 11, 2022 at 8:20pm

आदरणीय ब्रज जी सादर स्वागत आभार

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on April 11, 2022 at 7:54pm

बहुत खूब कहा आदरणीय मिश्रा जी...हार्दिक बधाई

Comment by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on April 10, 2022 at 10:17pm

आदरणीय लक्ष्मण सर बहुत बहुत आभार।

Comment by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on April 10, 2022 at 10:16pm

आदरणीय चेतन प्रकाश जी ग़ज़ल पर उपस्थिति के लिए सादर आभार।

1.इसमें ऐब-ए-तनाफुर कहाँ है?

2. मैं ग़ज़ल के उच्चारण आधारित लक्षण को ध्यान में रखता हूँ.....चूँकि मैं आदत और तेरी का सुस्पष्ट और अलग अलग उच्चारण कर पा रहा हूँ इस लिए इस मिसरे को भी मैं दोष रहित ही मानता हूँ। 

इसलिए मैं अपनी किसी भी ग़ज़ल में उच्चारण की समस्या सम्बन्धी इज़ दोष को उपेक्षित कर देता हूँ। 

अन्य शब्दों में कहूँ तो मैं इसे ऐब नहीं मानता।

Comment by Chetan Prakash on April 10, 2022 at 10:03am
आदाब, बंधु, बह्रे मुतदारिक मुसम्मन सालिम में ग़ज़ल कहने का अच्छा प्रयास किया है, आपने ! हाँ, एकाधिक मिसरे 'एब -ए - तनाफुर ' के दोष से ग्रसित हैं ;
1."जख़्म जब भी लगा दिल से दरिया कोई "
2.रंग बदलने की आदत तेरी गिरगिट"
देखिएगा !
Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on April 10, 2022 at 6:32am

आ. भाई पंकज जी, सादर अभिवादन। सुन्दर गजल हुई है। हार्दिक बधाई स्वीकारें।

Comment by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on April 3, 2022 at 8:23pm

आदरणीय बाऊजी सादर प्रणाम

आपके सुझाव समुचित हैं, सुधार अवश्य होगा।

Comment by Samar kabeer on April 3, 2022 at 8:08pm

प्रिय अज़ीज़म पंकज कुमार मिश्रा ख़ुश रहो, ग़ज़ल का अच्छा प्रयास हुआ है, बधाई स्वीकार करें I 

'हर्फ़ बन कागज़ों पर बिखरने लगा'

चूँकि आपने ग़ज़ल में प्रयोग हुए सभी उर्दू स्ग्ब्दों में नुक़्ते लगाये हैं इसलिए बता रहा हूँ कि इस मिसरे में 'कागज़ों ' को "काग़ज़ों" कर लें I

तन के भीतर जो उस आईने में उतर'

इस मिसरे में 'आईने' को "आइना" कर लें, वज़्न बिगड़ रहा है I 

'गिरगिटी रंगबाज़ी की आदत तेरी
सो जहाँ तू नज़र से उतरने लगा'

इस शे`र के सानी मिसरे पर विचार करें I 

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