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सूखी हुई है आज मगर इक नदी है तू...( ग़ज़ल :- सालिक गणवीर)

221 2121 1221 212

सूखी हुई है आज मगर इक नदी है तू
मैं जानता हूँ रेत के नीचे दबी है तू

मरना है एक दिन ये नई बात भी नहीं
जी लूँ ऐ ज़िंदगी तुझे जितनी बची है तू

आँखों को चुभ रही है अभी तेरी रौशनी
काँटा समझ रहा था मगर फुलझड़ी है तू

ऐ मौत कोई दूसरा दरवाजा खटखटा
आवाज़ मेरे दर पे ही क्यों दे रही है तू

हर बार ये लगा है तुझे जानता हूँ मैं
महसूस भी हुआ है कभी अजनबी है तू

आज़ाद हो रही हैं ये शह्रों की लड़कियाँ
खूँटे से गाँव में तो अभी तक बँधी है तू

साबित किया है तूने सुलह कर के बारहा
हर बार मैं ग़लत हूँ हमेशा सही है तू

* मौलिक एवं अप्रकाशित.

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Comment by सालिक गणवीर on October 14, 2020 at 4:21pm

आदरणीया दीपाली ठाकुर जी
सादर अभिवादन
ग़ज़ल पर आपकी उपस्थिती और सराहना के लिए ह्रदय तल से आपका आभारी हूँ.

Comment by Deepalee Thakur on October 14, 2020 at 4:12pm
बहुत ही सुन्दर ग़ज़ल कही ,बधाई स्वीकारें।
Comment by सालिक गणवीर on October 14, 2020 at 1:28pm

भाई जवाहर लाल सिंह जी
सादर अभिवादन
ग़ज़ल पर आपकी उपस्थिती और सराहना के लिए ह्रदय तल से आपका आभारी हूँ.

Comment by JAWAHAR LAL SINGH on October 10, 2020 at 1:26pm

आदरणीय सालिक गणवीर साहब, सभी शेर एक से बढ़कर एक हुए है. बधाई स्वीकारें!

Comment by सालिक गणवीर on October 3, 2020 at 10:36am

आदरणीय अमीरूद्दीन 'अमीर' साहिब
सादर अभिवादन
ग़ज़ल पर आपकी उपस्थिती और सराहना के लिए ह्रदय तल से आपका आभारी हूँ.

Comment by अमीरुद्दीन 'अमीर' on October 2, 2020 at 9:58pm

आदरणीय सालिक गणवीर जी आदाब, अच्छी ग़ज़ल हुई है मुबारकबाद पेश करता हूँ। सादर।

Comment by सालिक गणवीर on October 1, 2020 at 12:18pm

प्रिय भाई आशीष यादव जी
सादर अभिवादन
ग़ज़ल पर आपकी उपस्थिती और सराहना के लिए ह्रदय तल से आपका आभारी हूँ.

Comment by आशीष यादव on October 1, 2020 at 4:22am

आदरणीय सालिक गणवीर सर, ख़ूबसूरत ग़ज़ल पर बधाई स्वीकार कीजिए।

Comment by Nilesh Shevgaonkar on September 30, 2020 at 12:48pm

आ. सालिक गणवीर जी,

नया शेर बहुत कमाल हुआ है. पुनः बधाई 

Comment by सालिक गणवीर on September 29, 2020 at 11:24pm

भाई लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'
सादर अभिवादन
ग़ज़ल पर आपकी उपस्थिती और सराहना के लिए ह्रदय तल से आपका आभारी हूँ.

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