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नौ दो ग्यारह ...(लघुकथा)

" काल सुबह कु तैयार हो जाना! हमलोगा को लेने बस आवेगी।"

" किधर कु जाना है? मुकादम जी!" 

" अरे! उवा पिछली बेर गए थे न, मकान बनाने..."

" ओह! उधर कु तो मेरी लुगाई नही जावेगी।"

"कीयों?"

" बस ! मेरी मरजी... मेरी लुगाई है ... वो हरामी ठेकेदार और वाके आदमी... मेरी लुगाई पर..."

"अबे साले! तू क्या खुद को सलमान खान समझता है? तेरी लुगाई को संग लाना होगो वरना..." मुकादम ने जर्दा थूकते हुए अपने करीब खड़े अपने दोस्त से कहा," साला! हरामी! समझता नही यह, इसको काम इसकी लुगाई की वजह से ही तो मिलता है.... साला दलित... वरना इसकी औकात क्या है?"

उसके दोस्त ने कहा," अच्छा! तो क्या इसकी पत्नी दलित नही?" तू तो बोल रहा था, वो ठेकेदार तो जनोईधारी ब्राह्मण है..."

"अरे यार... अब क्या करूँ, पेट की ख़ातिर.... वो बामण तो इसकी लुगाई को ही चाहे है... और यह मुआ ..."

सामने से कटारी लेकर मजदूर की पत्नी दनदनाती हुई आती दिखाई पड़ती है, " मुकादम! बोल किधर चलना है, कंजर जाति की हूँ तो क्या हुआ, मेरी जाति लोगों को चीर कर ....।" 

उसकी लाल आँखे और अंगार बरसते शब्दों ने मुकादम को लगा उसके पैरो तले ज़मीन खिसक रही है...

पलक झपकते ही वह अपने मित्र के साथ नौ दो ग्याराह हो गया।

 

मौलिक अप्रकाशित, अप्रसारित 

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