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छंद- आल्‍ह, विधान- 31 मात्रा, (चौपाई +15), अंत 21

ढाई आखर प्रेम सत्य है, स्‍वीकारो पहचानो मित्र.

धन बल सुख-दुख आने-जाने, प्रीत बढ़ाओ जानो मित्र.

 

कहते हैं लँगड़े घोड़े पर, दुनिया नहीं लगाती दाँव,

भाग्‍य आजमाने के बदले, स्‍वेद बहाओ मानो मित्र.

 

युग बदले हैं हुए खंडहर, थी इमारतें कभी बुलंद,

अहंकार ने लूटा है मत, झूठी शान बखानो मित्र,

 

कर न सको अच्छा जीवन में, बुरा करो न कभी हर हाल,

हर दुष्‍कर्म है दलदल कीचड़, हाथ कभी मत सानो मित्र,

   

जीवन क्षण भंगुर है साहस, कर न सको तो रखना धैर्य,

हद से ज्‍यादा नहीं कभी भी, चादर लंबी तानो मित्र.

(मौलिक एवं अप्रकाशित)

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Comment by Dr. Gopal Krishna Bhatt 'Aakul' on May 14, 2020 at 8:45pm

आभार आदरणीय श्री लक्ष्‍मण धमी 'मुसाफि‍र जी एवं श्री समीर कबीर जी.

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on May 14, 2020 at 1:20pm

आ. भाई गोपाल जी, अच्छी गीतिका हुई है । हार्दिक बधाई ।

Comment by Samar kabeer on May 13, 2020 at 3:34pm

जनाब गोपाल कृष्ण जी आदाब,अच्छी गीतिका लिखी आपने,बधाई स्वीकार करें ।

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