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होली के इन रंगों में (ग़ज़ल)

बह्र मुतक़ारिब असरम मक़्बूज़ महज़ूफ़ 16-रुक्नी

(बह्र-ए-मीर)
2 2   2 2   2 2   2 2   2 2   2 2   2 2   2

छुपे हैं जाने कितने क़िस्से होली के इन रंगों में
प्यार मुहब्बत यारी रिश्ते होली के इन रंगों में

बच्चों की अठखेली इनमें और दुआएँ पुरखों की
जवाँ दिलों के ख़्वाब मचलते होली के इन रंगों में

नीला सब्ज़ गुलाबी पीला लाल फ़िरोज़ी नारंगी
जीवन के सब रंग झलकते होली के इन रंगों में

सदा मनाते आए होली मिल कर सब हिंदुस्तानी
हैं तहज़ीब के फूल महकते होली के इन रंगों में

भाई भाई हैं आमादा आपस में लड़ मरने पर
क्यूँ हैं अब के ख़ून के छींटे होली के इन रंगों में

ख़ून ख़राबा दंगे दहशत सस्ती सियासत और वबा
मिले हैं कैसे रंग ये भद्दे होली के इन रंगों में

आओ पाक बना दें फिर से 'शाहिद' हम इन रंगों को
सारी शफ़क़त डाल दें मिल के होली के इन रंगों में
(मौलिक व अप्रकाशित)

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Comment by रवि भसीन 'शाहिद' on March 11, 2020 at 3:37pm

आदरणीय उस्ताद-ए-मुहतरम, सादर प्रणाम। आपकी हौसला-अफ़ज़ाई के लिए बेहद शुक्र-गुज़ार हूँ सर।

//इस मिसरे में 'हिन्दोस्तानी' को "हिंदुस्तानी" कर लें।//

जी, बेहतर है सर, मैंने edit कर दिया है।

Comment by Samar kabeer on March 11, 2020 at 7:35am

जनाब रवि भसीन 'शाहिद' जी आदाब,होली के संदर्भ में ग़ज़ल का अच्छा प्रयास हुआ है,बधाई स्वीकार करें ।

'सदा मनाते आए होली मिल कर सब हिन्दोस्तानी'

इस मिसरे में 'हिन्दोस्तानी' को 

"हिंदुस्तानी" कर लें ।

Comment by रवि भसीन 'शाहिद' on March 10, 2020 at 12:25pm

आदरणीय लक्ष्मण भाई, आपकी हौसला-अफ़ज़ाई के लिए हार्दिक आभार, और आपको भी होली की ढेरों शुभकामनाएँ।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on March 10, 2020 at 7:59am

आ. भाई रवि भसीन जी, सादर अभिवादन एवं होली की हार्दिक शुभकामनाएं ।

होली के पावन पर्व की सम्पूर्णता को समेटे सुन्दर गजल हुई है । हार्दिक बधाई स्वीकारें ।

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