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"नाम के मुसलमान" - [लघु कथा- 16]

"फोन करने और 'ईद मुबारक़' कहने की क्या ज़रूरत थी ?" शबाना ने एतराज़ जताते हुए कहा।
" तो तुमने इतने सालों बाद भी मेरी आवाज़ पहचान ली थी ! फिर तुमने अपने शौहर को क्यों दे दिया फोन ?" कुछ नाराज़गी के लहज़े में आफताब ने पूछा।
"ग़ैर मर्दों से यूँ फोन पर बातें करना हमारे यहाँ मना है। आवाज़ क्या, तुम्हारी तो रग-रग से वाकिफ हूँ मैं तो !" लम्बी साँस लेते हुए शबाना ने उसे समझाया- " देखो, गढ़े मुर्दे उखाड़ कर ज़ख़म कुरेदने से कोई फायदा नहीं ! तुम्हारे वालिद साहब ही घर आये थे और उन्होंने बहुत पढ़ी लिखी बहू की मंशा ज़ाहिर की थी।"
"लेकिन....लेकिन शब्बो, मैंने तो ऐसा नहीं कहा तुमसे, मैंने तो तुम्हारी अम्मीजान से सिर्फ ये कहा था कि जब तक मैं अपने पैरों पर खड़ा न हो जाऊँ, शबाना की पढ़ाई जारी रखियेगा।"
"बात सिर्फ इतनी नहीं थी, हम भले बारहवीं पास नहीं कर पाये, लेकिन 'दीनी' और 'इस्लामी' तालीम है हमारे यहाँ, माशा अल्लाह ! ....और ..और तुम्हारे यहाँ तो एक वक़्त की नमाज़ तक के लिए वक़्त नहीं किसी के पास !
ऐसे 'मोडर्न' और 'रईस' होना भी किस काम का।"
"शबाना ! ये तुम कह रही हो ! "
"हाँ, आफताब साहब, अब तो तुम नई मोडर्न ज़िन्दगी ही जी रहे होगे न ? मिल गई न नये ज़माने की बहुत पढ़ी-लिखी बीवी ?"
"ओह, शबाना तुम्हें कैसे बताऊं कि मेरी नई ज़िन्दगी कैसी चल रही है और....और क्यूं ?"
" मैं तो अपने बच्चों और कम पढ़े-लिखेे मगर मज़हबी तालीम याफ्ता शौहर के साथ बेहद सुखी हूँ। जाओ आफताब, तुम अपनी ज़िन्दगी जियो और मुझे मेरी ज़िन्दगी जीने दो। और आईन्दा इस तरह हमारे घर मत आना ! हम ठहरे कट्टर मुसलमान और तुम लोग... तुम लोग तो बस नाम के मुसलमान। दो किनारे कभी नहीं मिलते ।"

(मौलिक व अप्रकाशित)

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Comment by Sheikh Shahzad Usmani on April 8, 2017 at 2:35am
मेरी इस ब्लोग-पोस्ट पर समय देने हेतु सभी पाठकों को तहे दिल से बहुत बहुत शुक्रिया।
Comment by Sheikh Shahzad Usmani on October 13, 2015 at 6:04pm
तहे दिल बहुत बहुत धन्यवाद आदरणीय Sunil Verma जी व आदरणीय Tej Veer Singh जी ।
Comment by TEJ VEER SINGH on October 13, 2015 at 1:23pm

बधाई शेख उस्मानी जी!बेहद खूबसूरत लघुकथा!

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