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गज़ल -5 ( दोपहर की धूप में बादल सरीखे छा गए)

2122 2122 2122 212

दोपहर की धूप में बादल के जैसे छा गए
मह्रबां बन कर वो मेरी ज़िंदगी मेें आ गए//१

ज़िन्दगी जीते रहे हम दुश्मनों की भीड़ में 
रहबरों के संग में ही आके धोका खा गए //२

झूठ सीना तान कर मैदान में अब चल रहा
सच ज़ुबाँ पे जो भी लाए वे खड़े शरमा गए //३

सर उठाओ ना हमारे सामने सागर हैं हम
ताल हो तुम एक बारिस देखकर बौरा गए //४

भीड़ में वो खो गए जो मर मिटे ईमान पर
छापकर अख़बार झूठे सुर्खियों में आ गए //५
-- क़मर जौनपुरी

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Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on November 21, 2018 at 11:59am

आ. भाई कमर जी, अच्छी गजल हुयी है । हार्दिक बधाई ।

Comment by क़मर जौनपुरी on November 21, 2018 at 9:56am

बहुत बहुत शुक्रिया आदरणीय।

Comment by VIPIN KUMAR SINGH on November 21, 2018 at 9:14am

बहुत सूंदर

Comment by TEJ VEER SINGH on November 18, 2018 at 12:30pm

हार्दिक बधाई आदरणीय क़मर जौनपुरी जी। बहुत सुंदर गज़ल।

भीड़ में वो खो गए जो मर मिटे ईमान पर
छापकर अख़बार झूठे सुर्खियों में आ गए //५

Comment by राज़ नवादवी on November 18, 2018 at 10:31am

जनाब क़मर जौनपुरी साहिब आदाब,सुन्दर ग़ज़ल की प्रस्तुति पे बधाई स्वीकार करें. सादर 

Comment by क़मर जौनपुरी on November 17, 2018 at 11:17pm

बहुत बहुत शुक्रिया जनाब समर कबीर साहब। आपकी इस्लाह से ग़ज़ल मुकम्मल हुई।

Comment by Samar kabeer on November 17, 2018 at 2:34pm

जनाब क़मर जौनपुरी साहिब आदाब,ग़ज़ल का प्रयास अच्छा है,बधाई स्वीकार करें ।

दोपहर की धूप में बादल सरीखे छा गए
तुम हमारी जिंदगी में मह्रबां बन आ गए'

इस मतले को यूं करलें,गेयता बढ़ जाएगी:-

'दोपहर की धूप में बादल के जैसे छा गए

मह्रबां बनकर वो मेरी ज़िंदगी मे आ गए'

' दुश्मनों की भीड़ में हम जिंदगी पाते रहे
रहबरों के संग में ही आके धोका खा गए'

इस शैर में तक़ाबुल-ए-रदीफ़ की सूरत बन गई है,ऊला मिसरा यूँ कर लें:-

"ज़िन्दगी जीते रहे हम दुश्मनों की भीड़ में'

' हम समंदर हैं हमारे सामने ना सर उठा 
ताल हो तुम एक बारिस देखकर बौरा गए'

इस शैर में शुतरगुरबा दोष है,इसे यूँ कर लें:-

'सर उठाओ न हमारे सामने सागर हैं हम

ताल हो तुम एक बारिश देखकर बौरा गए'

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