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तेरे आने से आये दिन सुहाने ।

1222 1222 122

.

तेरे आने से आये दिन सुहाने ।

हैं लौटे फिर वही गुजरे ज़माने ।।

भरा अब तक नही है दिल हमारा ।

चले आया करो करके बहाने ।।

हमारे फख्र की ये इन्तिहाँ है ।

वो आये आज हमको आजमाने ।।

बड़ी शिद्दत से तुझको पढ़ रहा था ।

हवाएं फिर लगीं पन्ने उड़ाने ।।

शिकायत दर्ज जब दिल में कराया ।

अदाएँ तब लगीं पर्दा हटाने ।।

नज़र से लूट लेना चाहते हैं ।

हैं मिलते लोग अब कितने सयाने ।।

न चर्चा कर यहाँ अपनी वफ़ा का ।

अभी तक घाव जिन्दा हैं पुराने ।।

गवाही आँख उनकी दे रही है ।

वो आए हैं फ़क़त रस्में निभाने ।।

जरा सी सच बयानी हो गयी तो ।

ज़माना आ गया मुझको झुकाने ।।

नसीहत दे रही है मुफ़लिसी भी ।

लगे हैं यार सब आँखे चुराने ।।

---नवीन मणि त्रिपाठी मौलिक अप्रकाशित

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Comment by Naveen Mani Tripathi on August 21, 2018 at 12:21pm

आ0 लक्ष्मण धामी साहब तहे दिल से शुक्रिया ।

Comment by Naveen Mani Tripathi on August 21, 2018 at 12:21pm

आ0 कबीर सर सादर नमन । इस महत्वपूर्ण इस्लाह हेतु हार्दिक आभार सर ।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on August 20, 2018 at 9:43pm

आ. भाई नवीन जी, सादर अभिवादन । सुंदर गजल हुयी है । हार्दिक बधाई ।

Comment by Samar kabeer on August 20, 2018 at 5:41pm

जनाब नवीन मणि त्रिपाठी जी आदाब,ग़ज़ल का अच्छा प्रयास हुआ है,बधाई स्वीकार करें ।

हमारे फख्र की ये इन्तिहाँ है'

इस मिसरे में 'इन्तिहाँ' को "इन्तिहा" कर लें ।

' शिकायत दर्ज जब दिल में कराया'

इस मिसरे में ऐब-ए-तनाफ़ुर देखें,और शिल्प भी,मिसरा यूँ कर सकते हैं:-

'शिकायत दर्ज की जब दिल में हमने'

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