For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

अखिलेश कृष्ण श्रीवास्तव's Blog (21)

बीते बरस का लेखा जोखा [अखिलेश कृष्ण ]

प्याज सब्जियाँ आलू दाल, किया हमें सब ने बेहाल।

खट्टी मीठी कड़वी यादें, देकर बीता पिछला साल॥

चारों तरफ से कर्जा उस पर, सभी फसल बर्बाद हुए।

आत्महत्या किसानों ने की, बात दुखद गंभीर सवाल॥

दस राज्य केंद्र में शासन है, पर बढ़ा मांस निर्यात।

चौंकाने वाली ये खबर है, गौ माता भी हुई हलाल॥

करोड़ों खर्च हुए संसद पर, काम के नाम पे ठेंगा है।

बस नारेबाजी बहिर्गमन, पुतलों का दहन, हड़ताल॥

आरोप और प्रत्यारोप हुए, मंत्री विधायक…

Continue

Added by अखिलेश कृष्ण श्रीवास्तव on January 1, 2016 at 7:37pm — 4 Comments

साहित्यकार कलाकार या गिरगिट के अवतार [व्यंग्य]. अखिलेश कृष्ण

अजी सुनते हो ..... पप्पू के पापा ।

 

धीरे बोलो भागवान, पड़ोसी क्या सोचेंगे।

 

मैंने कहा छोटे बड़े मँझले साहित्यकारों और पुरस्कृत कुछ लोग लुगाइयों में सम्मान लौटाने की होड़ लगी है। इन सब के थोपड़े हर चैनल्स में बार बार दिखाया जा रहा है। आप भी अपना सम्मान लौटा दीजिये।

 

कौन सा सम्मान ?

 

ये लो, ऐसे पूछ रहे हो जैसे 10–20  पुरस्कार और सम्मान प्राप्त कर चुके हो और सिर्फ नोबेल पुरस्कार ही लेना बाकी है। अरे जीवन में एक ही बार तो सम्मानित…

Continue

Added by अखिलेश कृष्ण श्रीवास्तव on November 20, 2015 at 2:19pm — 9 Comments

भारत की कुण्डली में तीन अमंगल ग्रह ( आल्हा छंद ) अखिलेश कृष्ण श्रीवास्तव

आल्हा छंद 

बरसों पहले बंधु बनाकर, चाउ -माउ चीनी मुस्काय।                                       

और उसे हम बड़े प्यार से,  भैया कहकर गले लगाय।।                            

 

हर आतंकी पाकिस्तानी, चाल चीन की समझ न आय ।                                                             

दो मुँह वाला अमरीका है, विकिलीक्स दुनिया को बताय।।                       

 

एक ओर है  पाक समस्या , और कहीं चीनी घुस जाय ।                           

*राम -…

Continue

Added by अखिलेश कृष्ण श्रीवास्तव on October 1, 2014 at 3:30pm — 12 Comments

हिन्दी - अपने ही घर में दासी (अखिलेश कृष्ण श्रीवास्तव)

अपने ही घर में दासी हिंदी                           

   हिंदी धीरे- धीरे समृद्ध हुई और फली फूली है। संस्कृत के सरल शब्दों, क्षेत्रीय बोलियाँ / भाषाओं को लेकर आगे बढ़ी, पवित्र गंगा की तरह लगातार कठिनाईयों को पार करते हुए । उर्दू , अरबी, फारसी आदि भी छोटी नदियों की तरह इसमें शामिल होती गईं जिससे हिंदी और मधुर हो गई। आज हिंदी के पास विश्व की किसी भी भाषा से अधिक शब्द हैं। लेकिन आजादी के बाद से सरकार की नीति से हिंदी निरंतर उपेक्षित होती गई। हिंदी के शब्द कोष में…

Continue

Added by अखिलेश कृष्ण श्रीवास्तव on September 3, 2014 at 8:30pm — 10 Comments

आल्हा छंद - मसाला क्रिकेट(आईपीएल) अखिलेश कृष्ण श्रीवास्तव

क्रिकेट की मंडी भारत है, जहाँ हर क्रिकेटर बिक जाय।  

लग जाती है जिसकी बोली, खुश होकर “याहू” चिल्लाय।।

 

पशु जैसे नीलाम हो गये, धन के आगे सब मजबूर।  

क्रेता इन सब का मालिक है, और सभी बँधुवा मजदूर॥  

अच्छा है मौजूद नहीं थे, जहाँ हुए थे सब नीलाम। 

ठोक बजाकर देखे जाते, नस्ल कौन सी, क्या है दाम।।

 

इज्ज़त से बढ़कर पैसा है, जो देता ऐश्वर्य तमाम।

खुश दिखते हैं बिकने वाले, नहीं बिके तो, नींद हराम॥      

खेल अज़ब है…

Continue

Added by अखिलेश कृष्ण श्रीवास्तव on May 3, 2014 at 7:30pm — 12 Comments

चुनावी चौपई ( चौपई छंद ) अखिलेश कृष्ण श्रीवास्तव

चौपई छंद - प्रति चरण 15 मात्रायें चरणान्त गुरु-लघु

==================================

ऋतु चुनाव की जब आ जाय। यहाँ वहाँ नेता टर्राय॥

सज्जन दिखते, मन में खोट। दांत निपोरें, माँगे वोट॥

 

जिसकी बन जाती सरकार। सेवा नहीं, करते व्यापार॥

नेता अफसर मालामाल। देश बेचने वाले दलाल॥

 

जब अपनी औकात दिखांय। बिना सींग दानव बन जांय॥

नख औ दांत तेज हो जाय। देश नोंचकर कच्चा खांय॥

 

है इनमें कुछ अच्छे लोग। न लोभी हैं, न कोई…

Continue

Added by अखिलेश कृष्ण श्रीवास्तव on May 1, 2014 at 1:00pm — 16 Comments

(कामरूप छंद) नकल न करें-अकल लगायें -अखिलेशकृष्ण श्रीवास्तव

(1)

अंग्रेजियत का, दंभ भरते, क्या दिये संस्कार।

रावण बनें कुछ, कंस भी हैं, पूतना भरमार ॥

नारी सुरक्षा, देश रक्षा, विफल है सरकार।

हैं बलात्कारी, आततायी,  व्याप्त भ्रष्टाचार ॥

              

(2)

नेता लफंगे, संग चमचे, जब पधारे गाँव।

वो गिड़गिड़ायें, वोट माँगें, पकड़ सब के पाँव॥

जीते अगर तो, भूल से भी, दिखें न बदमाश।

मंत्री बने तो, देश का फिर, करें…

Continue

Added by अखिलेश कृष्ण श्रीवास्तव on April 5, 2014 at 11:30am — 17 Comments

फिर आया मौसम चुनाव का - अखिलेश कृष्ण श्रीवास्तव

फिर आया मौसम चुनाव का, वोट की कीमत जानो।                                                                 

पाँच बरस फिर अवसर दे दो, सेवक को पहचानो॥                                                             

लोकतंत्र मजबूत बनेगा, संशय मन में न पालो।                                                                  

भई, वोट मुझे ही डालो।                                                                                                                                          …

Continue

Added by अखिलेश कृष्ण श्रीवास्तव on March 28, 2014 at 7:30pm — 11 Comments

होली के हुड़दंग - अखिलेश कृष्ण श्रीवास्तव

अब के बरस की होली में, कुछ ऐसा  रंग जमाएंगे।                                                                

भ्रष्ट को कालिख पोतेंगे, सज्जन को गुलाल लगाएंगे।।                                    

 

 

काले धन वालों को काला, और सभी को सतरंगी।                                                   

पिचकारी की तेज धार से, बदन सभी का भिगाएंगे।।                                                   

अब के बरस  की होली में, कुछ ऐसा  रंग…

Continue

Added by अखिलेश कृष्ण श्रीवास्तव on March 9, 2014 at 6:30pm — 15 Comments

“ डंकी” क्रिकेटर नाक कटाय ( आल्हा छंद - प्रथम प्रयास)अखिलेश कृष्ण श्रीवास्तव

मनुज रूप इंग्लैंड गये थे, वहाँ पहुँच “ डंकी ” कहलाय।

घुटने टेके, सिर भी झुकाय, गुलाम जैसा खेल दिखाय।

जब उपाधि डंकी की पाये, सब बेशर्मों सा मुस्काय।

वह रे क्रिकेटर हिन्दुस्तानी, अपनी इज़्ज़त खुद ही गवांय।

आस्ट्रेलिया में हाल खराब, सभी मैंच में हमें हराय।

अरबों रुपय कमाने वालों, दो कौड़ी का खेल दिखाय।

अफ्रीका में मैच भी हारे,  उस पर हाथ पैर तुड़वाय।                   

खेल दिखाये बच्चों जैसा , रोते गाते वापस…

Continue

Added by अखिलेश कृष्ण श्रीवास्तव on February 3, 2014 at 12:00pm — 12 Comments

संकट मोचन ( लघु कथा ) अखिलेश कृष्ण श्रीवास्तव

  •                                                     #   संकट  मोचन  #

 

आदि बेटे, मैं बहू को लेकर अस्पताल जा रही हूँ साथ में रंजना (बेटी) और अदिति ( पोती) भी। तुम गुरूजी को लेकर वहीं आओ।

 

आइये गुरूजी, प्रणाम। पोती के जन्म के समय आपने पूरा समय दिया था इस बार भी.......।

 

ठीक है मैया, मिठाई खाकर ही जाऊँगा। बहू को आशीर्वाद देते हुए - चिंता मत करो बेटी श्रीराधेकृष्ण की कृपा से इस बार भी सब कुछ सामान्य और सुखद होगा। हर समय…

Continue

Added by अखिलेश कृष्ण श्रीवास्तव on January 14, 2014 at 12:00pm — 15 Comments

नया वर्ष - नई सुबह (गीत) अखिलेश कृष्ण श्रीवास्तव

नई सुबह के स्वागत् में, हम वंदनवार लगायें।                                                    

रंग बिरंगे  फूलों से, घर आंगन  द्वार सजायें॥

 

नये वर्ष के  अभिनंदन में,  गीत नया हम गायें।

मंगल की सब करें कामना, मिलकर जश्न मनायें॥

 

फूल खिले हैं, बगिया महकी , हैं भँवरे मंडराये।

भ्रमर सरीखे हम भी झूमे , गुंजन करते जायें ॥

 

कुहू -कुहू जब कोयल कूके, चहुँदिश मस्ती छाये।

हम भी ऐसी  बोली  बोलें , मन सबका…

Continue

Added by अखिलेश कृष्ण श्रीवास्तव on January 1, 2014 at 12:30pm — 28 Comments

माँ जैसी प्यारी है मौत (गीत) अखिलेश कृष्ण श्रीवास्तव

ज़िन्दगी तू मौत से  पीछा छुड़ा न पाएगी।                                                                  

उम्र  बढ़ती जाएगी , करीब  आती जाएगी।।                                                                             

     

ज़िन्दगी सफर है और, मुक्ति है मंजि़ल…

Continue

Added by अखिलेश कृष्ण श्रीवास्तव on December 2, 2013 at 9:07am — 24 Comments

भिखारिन (हास्य व्यंग्य) अखिलेश कृष्ण श्रीवास्तव

छोटे शहर में ब्याही गईं, कुछ महानगर की लड़कियाँ।                   

जींस टॉप लेकर आईं, ससुराल में अपनी लड़कियाँ।।                   

 

बहुयें सभी बन गई सहेली, मुलाकातें भी होती रहीं।     

जींस-टॉप में पहुँच गईं, एक उत्सव में बहू बेटियाँ॥

 

सास -   ससुर नाराज हुए, पति देव बहुत शर्मिंदा हुए।                           

भिखारियों को घर पे बुलाए, साथ थी उनकी बेटियाँ।।

 

बड़ी देर तक समझाये फिर, जींस पेंट और टॉप…

Continue

Added by अखिलेश कृष्ण श्रीवास्तव on November 26, 2013 at 10:30pm — 31 Comments

दरुवा की दीवाली (हास्य व्यंग्य कविता) अखिलेश कृष्ण श्रीवास्तव

पीकर आया  दीवाली में,  बांह पकड़  बीबी से बोला।                              

तुम मधुमय अधरों वाली, और मैं प्यासा दरुवा भोला॥  ......   दरुवा = शराबी                                                                             

 

बीबी बोली, शर्म करो , दीवाली में  पीकर आये हो।      .......  पत्नी…

Continue

Added by अखिलेश कृष्ण श्रीवास्तव on November 1, 2013 at 3:10pm — 10 Comments

अमीरी की नई परिभाषा ( व्यंग्य कविता) अखिलेश कृष्ण श्रीवास्तव

बच्चन पूछे केबीसी में , रट लो शायद काम आए।                                                              

अमीरों की नई सूची बनेगी, शायद तेरा नाम आए॥                                             

 

प्याज के संग जो रोटी खाये, गरीब नहीं कहलाएंगे।                                        

तैंतीस रुपये कमाने वाले,…

Continue

Added by अखिलेश कृष्ण श्रीवास्तव on October 23, 2013 at 3:30pm — 15 Comments

सार्थक दशहरा (कविता)-अखिलेश कृष्ण श्रीवास्तव

सार्थक दशहरा

***************

धर्म की विजय हुई त्रेता में, राम ने मारा रावण को।

उसकी याद में हमने भी, हर साल जलाया रावण को॥                                 

कलियुग में मायावी रावण, रूप बदलकर आता है।              

वो भ्रष्टाचारी,  अत्याचारी,  अनाचारी कहलाता है॥          

अधर्मी रावण का पुतला, हर बरस जलाया जाता है।        

कई रूप में अंदर बैठा रावण, हँसता है, मुस्काता है॥              

अपने अंदर के रावण को ,…

Continue

Added by अखिलेश कृष्ण श्रीवास्तव on October 14, 2013 at 9:00am — 16 Comments

बड़े साहब की गाँधी जयंती (कविता)- अखिलेश कृष्ण श्रीवास्तव

बड़े साहब थे बड़े मूड में, भृत्य भेजकर मुझे बुलाये।                                                                                               

छुट्टी का दिन व्यर्थ न जाये, आओ इसे रंगीन बनायें॥                                                                                                          

आज के दिन जो मिले नहीं, उस चीज का नाम बताये।                                                                                            

और बोले कहीं से जुगाड़ करो, फिर…

Continue

Added by अखिलेश कृष्ण श्रीवास्तव on October 2, 2013 at 12:30am — 13 Comments

विदेशी भाषा एवं संस्कृति पर गर्व न करें ( हिंदी दिवस पर विशेष )

1 / आजादी के बाद ही हमें हिंदी को राष्ट्रभाषा, सरकारी कामकाज व न्यायालय की भाषा अनिवार्य रुप से घोषित कर देनी थी, पर अंग्रेज एवं भारत के अंग्रेजी पूजकों के बीच हुए समझौते ने और उसके बाद सत्ता पर बैठे अंग्रेजी समर्थकों ने भारत की आजादी को गुलामी का एक नया रुप दे दिया। “ तन से आजाद पर मन से गुलाम भारत का " और उसी दिन से शुरू हो गई भारत को धीरे - धीरे इंडिया बनाने की साजिश।

.

2 / आजादी के बाद सत्ता के चेहरे तो बदल गये पर चरित्र नहीं बदले। अंग्रेजों ने उन्हें पूरी तरह…

Continue

Added by अखिलेश कृष्ण श्रीवास्तव on September 14, 2013 at 7:00pm — 16 Comments

त्योहारों पर कुछ कहना है

गणेशोत्सव- हे विघ्न विनाशक  

अनाचार है, अत्याचार है, गणपति इसका निदान करें।

कुछ न सूझे तो हे बप्पा , मेरे कथन पे विचार करें॥

विघ्न डालें उनके कार्य में, जो हैं देश के भ्रष्‍टाचारी ।

लेकिन उन्हें निराश न करना, द्वार जो आए सदाचारी॥

नवरात्रि

न फूहड़ वस्त्र न बेशर्मी, सब कुछ शुभ हो त्योहारों में।

गरबा हो या नृत्य कोई , तन हो पवित्र त्योहारों में॥

खेल नहीं है माँ की पूजा, विधि विधान…

Continue

Added by अखिलेश कृष्ण श्रीवास्तव on September 8, 2013 at 1:30pm — 4 Comments

Monthly Archives

2016

2015

2014

2013

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Activity

लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on Sushil Sarna's blog post दोहा सप्तक ..रिश्ते
"आ. भाई सुशील जी, सादर अभिवादन। अच्छे दोहे हुए हैं। हार्दिक बधाई। आ. भाई मिथिलेश जी की बात का…"
12 hours ago
Aazi Tamaam commented on Aazi Tamaam's blog post ग़ज़ल : मिज़ाज़-ए-दश्त पता है न नक़्श-ए-पा मालूम
"बहुत बहुत शुक्रिया आ ममता जी ज़र्रा नवाज़ी का"
yesterday
Aazi Tamaam commented on Aazi Tamaam's blog post ग़ज़ल : मिज़ाज़-ए-दश्त पता है न नक़्श-ए-पा मालूम
"बहुत बहुत शुक्रिया ज़र्रा नवाज़ी का आ जयनित जी"
yesterday
Aazi Tamaam commented on Aazi Tamaam's blog post ग़ज़ल : मिज़ाज़-ए-दश्त पता है न नक़्श-ए-पा मालूम
"ग़ज़ल तक आने व इस्लाह करने के लिए सहृदय शुक्रिया आ समर गुरु जी मक़्ता दुरुस्त करने की कोशिश करता…"
yesterday
Samar kabeer commented on Sushil Sarna's blog post दोहा पंचक. . . . . गिरगिट
"//सोचें पर असहमत//  अगर "सोचें" पर असहमत हैं तो 'करें' की जगह…"
yesterday
Sushil Sarna commented on Sushil Sarna's blog post दोहा पंचक. . . . . गिरगिट
"आदरणीय समीर कबीर साहब , आदाब, सर सृजन के भावों को मान देने का दिल से आभार आदरणीय । 'हुए'…"
yesterday
Samar kabeer and Mamta gupta are now friends
yesterday

सदस्य कार्यकारिणी
मिथिलेश वामनकर commented on Ashok Kumar Raktale's blog post गीत - पर घटाओं से ही मैं उलझता रहा
"वाह वाह वाह वाह वाह  आदरणीय अशोक रक्ताले जी, वाह क्या ही मनमोहक गीत लिखा है आपने। गुनगुनाते…"
yesterday
Samar kabeer commented on Sushil Sarna's blog post दोहा पंचक. . . . . गिरगिट
"जनाब सुशील सरना जी आदाब, अच्छे दोहे लिखे आपने, बधाई स्वीकार करें । 'गिरगिट सोचे क्या…"
Monday

सदस्य कार्यकारिणी
मिथिलेश वामनकर replied to Admin's discussion 'ओबीओ चित्र से काव्य तक' छंदोत्सव अंक 157 in the group चित्र से काव्य तक
"हार्दिक आभार आपका।"
Sunday

सदस्य कार्यकारिणी
मिथिलेश वामनकर replied to Admin's discussion 'ओबीओ चित्र से काव्य तक' छंदोत्सव अंक 157 in the group चित्र से काव्य तक
"सही कहा आपने "
Sunday

सदस्य कार्यकारिणी
मिथिलेश वामनकर replied to Admin's discussion 'ओबीओ चित्र से काव्य तक' छंदोत्सव अंक 157 in the group चित्र से काव्य तक
"आदरणीय आप और हम आदरणीय हरिओम जी के दोहा छंद के विधान अनुरूप प्रतिक्रिया से लाभान्वित हुए। सादर"
Sunday

© 2024   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service