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हे प्रभु ! मृत्यु आपके हाथ में है परंतु मरे तो मरे कौन और कब मरे?

प्रस्तुत कविताएँ ' पारसनाथ ' द्वारा रचित हैं . इन कविताओं को
मेरे दादाजी अक्सर सुनाया करते हैं. आपको भी पसंद आयेंगी .

1.

प्रस्तुत कविता में एक किसान ईश्वर को अपनी व्यस्तता
बताते हुए अर्ज करता है कि आप ही मेरे मरने का समय
निश्चित करो-

फागुन में मरूँ तो कच्चा अनाज रहे,
चइत में ताव आयो कटिया कराइके,
बैसाख अऊर जेठ में दौंरी व ओसवनी रही,
चढ़त असाढ़ फिर हल की जोताई है,
सावन व भादों में सोहनी व रोपिया रही,
चढ़त कुआर फिर कोदवे कटाई है,
कातिक में बावग तो चहुँदिस खुल गयो,
अगहन व पुस में जौ की सिंचाई है,
माघ में मरूँ तो घर में अनाज न रहे,
केते दिन भूखे रहत, फागुन निअराई है,
प्रभु से विनती पारसनाथ करत हौं,
कब मरूँ प्रभु आप ही बताइ हैं.

2.

प्रस्तुत कविता में एक किसान ईश्वर को परिवार के सभी
सदस्यों की महत्ता को बताते हुए अर्ज करता है कि आप ही
निश्चित करो कि कौन मरे-

लड़का मरे तो सुनी होत मातु गोद,
जुबा (युवा) मरे तो नारि घर में रुलाई है,
अधबुड़ मरे तो परिवार को सँभाले कौन,
चौथापन आई निगचाई है,
बुढ़ा मरे तो फिर घर की मलिकाई गयो,
घर की पुरानी रीति बुढ़िया बताई है,
जुवती मरे तो लड़के को दुख होय,
लड़का ना रहे तो नाम ही मिटाई है,
प्रभु से विनती पारसनाथ करत हौं,
कौन मरे प्रभु आप ही बताइ हौं.

संकलनकर्ता-
प्रभाकर पाण्डेय
मोबाइल- 8975941372
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Replies to This Discussion

Bahut hi badhiya sankalan hai, sri Paras Nath jee ney apni kavita key madhyam sey baut hi sharal shabdo mey aam logo key manobhav ko vyakt kar diyey hai,
bahut badhia sir ji
अब तो प्रभु भी डरते हैं मृत्यु लोक से
इतनी अंधेरगर्दी जो है
बहुत ही सुन्दर कविता.
पहिली कविता हमके बहुत ही बढ़िया लागल.
एह कविता में किसान के बारे में कहल जात बा की बिचारा के कबहूँ ना समय रहेला उ चाहे सावन हो, चाहे फागुन. फिर भी त सब ओकरे के लूटत बा.

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