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इस बार का तरही मिसरा 'बशीर बद्र' साहब की ग़ज़ल से लिया गया है|
"ज़िंदगी में तुम्हारी कमी रह गई"
वज्न: 212 212 212 212
काफिया: ई की मात्रा
रद्दीफ़: रह गई
इतना अवश्य ध्यान रखें कि यह मिसरा पूरी ग़ज़ल में कहीं न कही ( मिसरा ए सानी या मिसरा ए ऊला में) ज़रूर आये|
मुशायरे कि शुरुवात शनिवार से की जाएगी| admin टीम से निवेदन है कि रोचकता को बनाये रखने के लिए फ़िलहाल कमेन्ट बॉक्स बंद कर दे जिसे शनिवार को ही खोला जाय|

इसी बहर का उदहारण : मोहम्मद अज़ीज़ का गाया हुआ गाना "आजकल और कुछ याद रहता नही"
या लता जी का ये गाना "मिल गए मिल गए आज मेरे सनम"

विशेष : जो फ़नकार किसी कारण लाइव तरही मुशायरा-2 में शिरकत नही कर पाए हैं
उनसे अनुरोध है कि वह अपना बहूमुल्य समय निकाल लाइव तरही मुशायरे-3 की रौनक बढाएं|

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बागी भैया
बेहतरीन ख्याल...आपकी अदायगी में समाज को बदलने का जज्बा एकदम शीशे की तरह साफ नज़र आता है |
घर नया ले लिया शहर में बेटे ने,
बाप माँ को वही झोपड़ी रह गई,

ये शहरी संस्कृति की ही तो देन है...लोग माँ बाप को ही भूल रहे है|
अलबत्ता गाँव में भी कई कुरीतियाँ हैं

जो सभी को खिला बैठी खाने बहू,
उसकी हिस्से की रोटी जली रह गई,
*******
बेटियों के लिये तरसता इक पिता,
लालसा कन्यादान की दबी रह गई,

आपकी ग़ज़ल मानवीय सरोकारों और संवेदनाओं की लीडरी करती नज़र आती है|
एक दो जगह बहर की त्रुटियों को बिसरा दें तो बेहतरीन ग़ज़ल है|
आपके जज्बे को नमन करता हूँ|
नवीन भैया जितना लूटा है उसका एक हिस्सा इधर भी वापस कीजिये|
बहुत बहुत धन्यवाद भाई राणा जी, यह सब आप लोगो की संगत का असर है कि कुछ मैं भी कह लेता हूँ और विवेचनात्मक टिप्पणी के लिए पुनः शुक्रिया |
नवीन भैया शुक्रिया हनुमान...ओह!! नहीं गणेश जी को उनका बल याद दिलाने का|
नविन भईया आपने इस टिप्पणी के माध्यम से मुझे बहुत कुछ दे दिया, लूटे गये मुशायरा का हिस्सा भी, हा हा हा हा हा, इस अनुभवी टिप्पणी द्वारा आपने तो मुझे बी-काम्प्लेक्स दे दिया है, बहुत बहुत धन्यवाद आपको,
>>>>घर नया ले लिया शहर में बेटे ने,
बाप माँ को वही झोपड़ी रह गई..

गणेशजी आपने वो कहा जो अबतक अनकहा था... और कहा तो कैसे कहा .. वाह!!
इस कहे पर क्या कहूँ ? इस एक ने बहुत गहरे छुआ.. आपके पटने का घर-घर घूम गया आँखों के आगे... वैसे ये थोड़ा और कसाता..
मगर कुबूल है .. कुबूल है.. तहे दिल से कुबूल..
आदरणीय सौरभ सर, आपके टिप्पणी के बाद मैं अपने कहन को ग़ज़ल कह सकता हूँ इससे पहले तो वो सिर्फ और सिर्फ कहन भर था , आपने जो इस ग़ज़ल को इज्जत दी उसके लिये आभारी हूँ , शुक्रिया ,
बहुत खूब बागी भाई, "देर आयद दुरुस्त आयद" वाली कहावत को सही साबित कर दिया आपने ! देरी से आए मगर अच्छी तरह मुसल्लाह होकर आए ! अच्छी गजल कही है अपने ! यूँ तो सभी शेअर एक मुनफरिद जज्बे से मलबूस है मगर इन दो शेअरों को पढ़कर बेसाख्ता दिल से वाह निकली :

//घर नया ले लिया शहर में बेटे ने,
बाप माँ को वही झोपड़ी रह गई,

जो सभी को खिला बैठी खाने बहू,
उसकी हिस्से की रोटी जली रह गई, //

हकीक़त और ज़मीन से जुड़े हुए शेअर पढने का लुत्फ़ ही कुछ और होता है, बहुत अच्छे !
गुरुदेव आपके सानिध्य में रहकर जो कुछ कह लेता हूँ वो सब आप गुनीजनो की कृपा मात्र ही है, बहुत बहुत धन्यवाद जो आपने इस ग़ज़ल को सराह कर मेरी कलम को इज्जत बक्सी,
बहुत अच्छे. आज़र साहब से सहमत हूँ. ''आपकी ग़ज़ल में त्रुटि जो हैं, वो अल्फाजों की अदला बदली जैसी है|'' नवीन जी! यह अदला-बदली कर दीजिये तो मुझे और मुझ जैसे कुछ और कुछ सीख सकेंगे. सिर्फ तारीफ और कमी न हो, साथ ही सुधार भी हो सके तो मकसद पूरा होगा.
शुक्रिया आदरणीय सलिल जी , आपकी टिप्पणी किसी प्रशस्तिपत्र से कम नहीं होता है मेरे लिये ,
नविन भाई मैं आपकी बातों से सहमत हूँ, पर कभी कभी कुछ गलतियाँ जान बुझ कर भी करनी पड़ती है , जैसे "कन्यादान" शब्द का कोई जोड़ नहीं है और इसे "दान-ए-कन्या" शब्द से बदला नहीं जा सकता, क्योकि "कन्यादान" एक रश्म का नाम है, और अर्थ समान होते हुए भी "दान-ए-कन्या" का भाव और प्रभाव वह नहीं हो सकता |
वाह अनुज, बहुत ही सुंदर ग़ज़ल है | रद्दीफ़ तो है, ही मगर ग़ज़ल में पूरी तरह से गहराई है | प्रत्येक शेर लाजवाब है | बधाई |

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