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पढ़े-लिखे हैं आप तो - डॉo विजय शंकर

पढ़े-लिखे हैं आप तो आपको
पढ़े-लिखे दिखना चाहिए।
मोटर कार हो सब ,फिर भी अक्ल से ,
आपको , बिलकुल पैदल दिखना चाहिए।
कपड़े अजीब, चाल अजीब , हाव-भाव अजीब ,
बातचीत में अजीब होना और दिखना चाहिये।
रचनात्मक होना तो बहुत कठिन होता है ,
विध्वंस और क्रान्ति की बात करनी आनी चाहिए।
सबसे बड़ी बात आपको
घर फूंक तमाशा देखना आना चाहिए।
अपनी बुनियाद को निरंतर हिलाना और
मौक़ा लगते ही उखाड़ देना चाहिए।
आपको वो तो लपक लेंगे ही
जो उकसा रहे हैं ,
उनकें यकीन पे मिट जाना चाहिए।
खुद भले आप हमेशा सोये सोये से रहें ,
लक्ष्य अपना जन चेतना को जगाना बताना चाहिए ,
और कुछ आये न आये , नारे लगाना आना चाहिए।
तोड़ - फोड़ में माहिर ,
कन्स्ट्रटिव बिलकुल नहीं , आपको
कम्प्लीट डिस्ट्रक्टिव होना चाहिए।

मौलिक एवं अप्रकाशित

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Comment by Samar kabeer on November 14, 2017 at 10:58am
//इस लघुकथा के माध्यम से मैंने अपने ही प्रवेश में व्याप्त उस समस्या की और ध्यान आकर्षित करने का प्रयास किया है//
लेकिन मुहतरम ये लघुकथा तो किसी भी ज़ाविये से नहीं लगती?,इसका अंदाज़ कविता जैसा है,और मैंने इसे कविता की तरह ही पढ़ा भी है, ये तो अब पता चला कि ये लघुकथा है, और आपने शीर्षक के साथ विधा का उल्लेख भी नहीं किया,इसी कारण से मैंने लिखा कि ये आपके स्तर की रचना नहीं है,थोड़ा ग़ौर कीजियेगा ।
Comment by Dr. Vijai Shanker on November 14, 2017 at 10:34am
आदरणीय समर कबीर साहब , नमस्कार , रचना के प्रति आपकी बधाई हेतु ह्रदय से आभार एवं धन्यवाद। इस लघु-कथा के माध्यम से मैंने अपने ही प्रवेश में व्याप्त उस समस्या की ओर ध्यान आकर्षित करने का प्रयास किया है जिसे हम identity cricis कहते हैं। वैसे तो यह समस्या विश्व स्तर की है पर हमारे अपने परिवेश में कुछ अधिक ही उभरी हुयी है। हम यह तय ही नहीं कर पाये हैं कि हमारी प्राथमिकताएं क्या हैं ? हमें शिक्षा चाहिए या नहीं चाहिए। चूँकि सम्राट अशोक और अकबर कौन से स्कूल गए थे अतः स्कूल जरूरी है या नहीं। काम तो सब ठीक ही चल रहा है। स्कूल है तो टीचर चाहिए ? क्यों? काम तो सब चल ही रहा है और ठीक चल रहा है। पढ़े - लिखे को काम देना है , क्यों , बगैर पढ़े - लिखे भी तो अच्छा काम कर रहे हैं। नतीजा यह है कि पढ़ा- लिखा आदमी पीछे हुआ जा रहा है , पढ़ लिख कर भी वह पढ़ा- लिखा दिखना नहीं चाहता है। व्यवस्था में यह समस्या नहीं एक वैकल्पिक व्यवस्था के रूप बना चुकी है। हम एक ऐसा परिवेश बना चुके हैं जिसमें पढ़-लिख कर युवा वर्ग स्वयं को ठगा हुआ पा रहा है। .... भी बहुत कुछ है। शायद मैं इस तथ्य को सही स्वरुप दे नहीं पाया , फिर प्रयास करूंगा। सादर।
Comment by Kalipad Prasad Mandal on November 14, 2017 at 8:16am

आ विजय शंकर जी ,आदाब , सामयिक एवं करारा तंज लिए रचना के लिए हार्दिक बधाई |

Comment by Mohammed Arif on November 13, 2017 at 6:33pm
आदरणीय विजय शंकर जी आदाब, बहुत ही कटाक्षपूर्ण रचना । हार्दिक बधाई स्वीकार करें ।
Comment by Samar kabeer on November 13, 2017 at 5:11pm
आली जनाब डॉ.विजय शंकर जी आदाब,कविता अच्छी है,और तंज़ के तीर भी चला रही है,फिर भी ये मुझे आपके स्तर की नहीं लगी,बहरहाल इस प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार करें ।

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