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चाहतें - क्षणिकाएं -- डॉo विजय शंकर

ज़िन्दगी बोझ थी नहीं
अपनी ही चाहतों से
एक बोझ बना लिया
हमने ..............1.

सच में ,
चाहना तुझको था ,
तुझसे ही चाहते
रह गए .............2.


ज़िन्दगी भर
ज़िन्दगी को
ढूंढते रहे ,
वो मिली भी नहीं
और हम ज़िंदा भी रहे .....3.


मौलिक एवं अप्रकाशित

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Comment

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Comment by Dr. Vijai Shanker on December 25, 2016 at 8:02am
आदरणीय नरेंद्र सिंह चौहान जी , रचना को स्वीकृति प्रदान करने के लिए आभार एवं धन्यवाद , सादर।

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on December 25, 2016 at 3:48am

आदरणीय डॉ. विजय शंकर सर, जबरदस्त क्षणिकाएं लिखी है आपने. हार्दिक बधाई 

Comment by pratibha pande on December 24, 2016 at 7:36pm

ज़िन्दगी भर
ज़िन्दगी को
ढूंढते रहे ,
वो मिली भी नहीं
और हम ज़िंदा भी रहे .....क्या बात है ..आपकी चिर परिचित शैली से कुछ अलग ...हार्दिक बधाई आपको आदरणीय 

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on December 24, 2016 at 3:05pm

वाह विजय सर ! हर क्षणिका दमदार लगी . बहुत बहुत बधाई

Comment by narendrasinh chauhan on December 24, 2016 at 11:52am

खूब सुन्दर रचनाए सर

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