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मैं हूँ बंदी बिन्दु परिधि का , तुम रेखा मनमानी I

मैं हूँ बंदी बिन्दु परिधि का , तुम रेखा मनमानी I 
मैं ठहरा पोखर का जल , तुम हो गंगा का पानी I I

मैं जीवन की कथा -व्यथा का नीरस सा गद्यांश कोई इक I 
तुम छंदों में लिखी गयी कविता का हो रूपांश कोई इक I 

मैं स्वांसों का निहित स्वार्थ हूँ , तुम हो जीवन की मानी I I

धूप छाँव में पला बढा मैं विषम्तायों का हूँ सहवासी I 
तुम महलों के मध्य पली हो ऐश्वर्यों की हो अभ्यासी I 
मैं आँखों का खारा संचय , तुम हो वर्षा अभिमानी I I

विपदायों , संत्रासों से मेरा अटूट अनुबंध रहा है I 
पीड़ा से अनभिज्ञ रही तुम सुख से ही सम्बन्ध रहा है I 
मैं शमशानी श्वेत वस्त्र हूँ , तुम हो चूनर धानी I I

सुबह शाम सा दो स्वासों का मिलन सदा ही रहा असंभव I 
"'अजय "सत्य है फिर भी जीवन तट बंधों पर ही है संभव I 
तुम उजला सन्दर्भ हो , जिसका मैं हूँ वही कहानी I I

मैं हूँ बंदी बिन्दु परिधि का तुम रेखा मनमानी I 
मैं ठहरा पोखर का जल तुम हो गंगा का पानी I I

अप्रकाशित / अमुद्रित :

अजय कुमार शर्मा

Views: 891

Comment

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Comment by somesh kumar on December 16, 2014 at 11:16pm

सुंदर ,भावपूर्ण ,हृदय मोह लिया आपने 

Comment by Dr. Vijai Shanker on December 16, 2014 at 8:48pm
मैं हूँ बंदी बिन्दु परिधि का तुम रेखा मनमानी I
मैं ठहरा पोखर का जल तुम हो गंगा का पानी I I
सुन्दर, बधाई , आदरणीय अजय शर्मा जी, सादर।

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on December 16, 2014 at 6:55pm

बहुत सुन्दर गीत वाह ...बधाई अजय जी 

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on December 16, 2014 at 12:01pm

अजय जी

मुखड़े ने मन मोह लिया  i अच्छी रचना के लिए आपको बधाई i

कृपया ध्यान दे...

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