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तुम यूँ ही बीच राह में

रोज़ तरूवर क़ी छाँव में

मुझे यूँ ही रोक लेते हो 

और मैं भी रुक जाती हूँ

क्यों कि मैं भी रहती हूँ अधीर

तुमसे मिलकर बातें करने को!

 

तुम्हारा यूँ एकटक निहारना

मेरे दिल को भाता है बहोत*

मैं भी देखने लगती हूँ तुम्हें

सीधी कभी तिरछी नज़रों से

तुम मुस्कुरा देते हो शरारत से

मैं शर्माकर कुरेदती हूँ ज़मीन  

 

पर ये सब भी कब तलक

जब ये कुहासा नहीं होगा

बढ़ जाएगी आवाजाही

तब रास्ता भी वीरान नहीं होगा

तब उठेगी मिलने क़ी पीर

तब तुम आना नदी के तीर! ! !

 

*बहुत

 मौलिक व अप्रकाशित

- प्रदीप देवीशरण भट्ट  -

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Comment

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Comment by प्रदीप देवीशरण भट्ट on January 7, 2020 at 1:45pm

शुक्रिया लक्ष्मण जी

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on January 6, 2020 at 3:53pm

आ. भाई प्रदीप देवीशरण जी, सादर अभिवादन। अच्छी रचना हुई है । हार्दिक बधाई ।

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