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लेती है इम्तिहान ये उल्फ़त कभी कभी

221 2121 1221 212

लेती है इम्तिहान ये उल्फ़त कभी. कभी ।
लगती है राहे इश्क़ में तुहमत कभी कभी ।।

आती है उसके दर से हिदायत कभी कभी ।
होती खुदा की हम पे है रहमत कभी कभी ।।

चहरे को देखना है तो नजरें बनाये रख ।
होती है बेनक़ाब सियासत कभी कभी ।।

यूँ ही नहीं हुआ है वो बेशर्म दोस्तों ।
बिकती है अच्छे दाम पे गैरत कभी कभी ।।

मुझ पर सितम से पहले ऐ क़ातिल तू सोच ले ।
देती सजा ए मौत है कुदरत कभी कभी ।।

इज़हारे इश्क़ मैं ही किये जा रहा हूँ यार ।
कुछ तो उठाएं आप भी ज़हमत कभी कभी ।।

आसां नहीं है मैक़दे को भूलना सनम ।
देती सकून रिन्द की सुहबत कभी कभी ।।

उसने बुला लिया है तो मर्जी खुदा की है ।
किस्मत से मिलती यार की कुर्बत कभी कभी ।।

जुगनू की तर्ह जश्न मनाना मेरे हबीब ।
जब आये जिंदगी में वो जुल्मत कभी कभी ।।

कैसे ग़ज़ल कहूं मैं यहाँ मुश्किलात में ।
मिलती है आजकल मुझे मुहलत कभी कभी।।

कब तक कहेंगे आप मियां शाम को सहर ।
सच के लिए भी कीजिये हिम्मत कभी कभी ।।

-- नवीन मणि त्रिपाठी
मौलिक अप्रकाशित

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Comment by Naveen Mani Tripathi on August 15, 2019 at 8:14pm

आ0 प्रतिभा पांडेय जी ग़ज़ल तक आने के लिए तहेदिल से बहुत बहुत शुक्रिया ।

Comment by Naveen Mani Tripathi on August 15, 2019 at 8:13pm

आ0 लक्ष्मण धामी मुसाफ़िर साहब तहेदिल से बहुत बहुत शुक्रिया ।

Comment by Pratibha Pandey on August 15, 2019 at 5:50pm

प्रणाम त्रिपाठी जी शानदार ग़ज़ल के लिए हार्दिक शुभकामनाएँ 

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on August 15, 2019 at 5:38am

आ. भाई नवीन जी, अच्छी गजल हुई है । हार्दिक बधाई।

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