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यार पंकज, चुन सुकूँ, रख बन्द आँखें, मौन धर-----ग़ज़ल

2122 2122 2122 212

मौन रह अपनी ज़रूरत के लिए ए मित्रवर
तू समस्याओं पे काहें को फ़िराता है नज़र

यूँ भी सदियों से लुटेरे आबरू लूटा किए
रोकने की क्या ज़रूरत लूट लेंगे अब अगर

चाय अपनी दाल रोटी चल रही दासत्व से
तो भला ज़िद ठान बैठा है तू क्यूँ सम्मान पर

साख़ पर उल्लू हैं लाखों क्या हुआ, जाने भी दे
छोड़ चिंता बाग की, बस धन पे रख अपनी नज़र

क्या गरज तुझको पड़ी क्यूँ नींद अपनी खो रहा
यार पंकज, चुन सुकूँ, रख बन्द आँखें, मौन धर

मौलिक-अप्रकाशित

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Comment by Samar kabeer on April 23, 2019 at 2:51pm

अज़ीज़म पंकज कुमार मिश्रा आदाब,ग़ज़ल का प्रयास अच्छा है,बधाई स्वीकार करें ।

'मौन रह अपनी ज़रूरत के लिए ए मित्रवर
तू समस्याओं पे काहें को फ़िराता है नज़र'

मतले में शुतरगुरबा दोष है,ऊला में 'मित्रवर' शब्द आदर सूचक है,और सानी में 'तू' ग़ौर करें

Comment by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on April 20, 2019 at 11:18pm
आदरणीय बसन्त जी बहुत बहुत आभार
Comment by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on April 20, 2019 at 11:15pm
आदरणीय दिगम्बर सर बहुत बहुत आभार
Comment by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on April 20, 2019 at 11:14pm
आदरणीय बृजेश जी बहुत बहुत आभार
Comment by बसंत कुमार शर्मा on April 19, 2019 at 9:40pm

आदरणीय पंकज जी सादर नमस्कार, वाह क्या कहने 

Comment by दिगंबर नासवा on April 19, 2019 at 8:03pm

अच्छा प्रयास है ग़ज़ल का पंकज जी ... बहुत बधाई ... 

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on April 19, 2019 at 3:38pm

वाह बड़ी ही खूब ग़ज़ल कही है आदरणीय..बहुत बहुत बधाई

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