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मुहब्बत अपनी लोगों ने सियासत से है कम कर ली - लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर

१२२२ १२२२ १२२२ १२२२


जमा पूँजी थी  बरसों  की  जरुरत  ने हजम कर ली
मुहब्बत अपनी लोगों ने सियासत से है कम कर ली।१।


जमाना  अब  तो  हँसने  का  हँसेंगे  सब  तबाही पर
किसी दूजे के गम से कब किसी ने आँख नम कर ली।२।


सदा से नाज था जिसके वचन की सादगी पर ढब
उसी ने आज हमसे भी  बड़ी  झूठी कसम कर ली।३।


मुहब्बत रास आती  क्या  जफाएँ हर तरफ उस में
हमीं ने यूँ हर इक रंजिश खुशी से हमकदम कर ली।४।


बिगड़ जाती थी जो छोटी बड़ी हर बात पर हमसे
वही तकदीर मुट्ठी में  कसम  से अपने दम कर ली।५।


मिली हिस्से में जितनी थी नहीं जब रास आई तो
बढ़ा कर हर परेशानी  हमीं  ने  यूँ  अगम कर ली।६। 
*******
मौलिक/अप्रकाशित
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

Views: 472

Comment

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Comment by Samar kabeer on March 1, 2019 at 3:50pm

//हजम शब्द हिंदी में इसी रूप में प्रयोग होता है अतः मैंने भी प्रयोग किया । क्या ऐसा प्रयोग अनुचित है ?//

भाई,"हज़्म" शब्द अरबी भाषा का है इसलिए इसे हिन्दी भाषा के हिसाब से प्रयोग करना तो उचित नहीं होगा न?आप इस शब्द को इसके सहीह उच्चारण के साथ ही प्रयोग करें ।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on March 1, 2019 at 3:38pm

आ. भाई समर जी, सादर अभिवादन । गजल पर उपस्थिति और सलाह के लिए आभार । 

हजम शब्द हिंदी में इसी रूप में प्रयोग होता है अतः मैंने भी प्रयोग किया । क्या ऐसा प्रयोग अनुचित है ? मार्गदर्शन कीजिए ।

तीसरे शेर को संप्रेषणीय बनाने का शीघ्र रयास करता हूँ।

Comment by Samar kabeer on February 25, 2019 at 2:20pm

जनाब लक्ष्मण धामी 'मुसाफ़िर'जी ग़ज़ल का अच्छा प्रयास है,बधाई स्वीकार करें ।

'जमा पूँजी थी  बरसों  की  जरुरत  ने हजम कर ली'

आपकी जानकारी के लिए बता रहा हूँ कि इस मिसरे में सहीह शब्द "हज़्म"21 है,देखियेगा ।

'सदा से नाज था जिसके वचन की सादगी पर ढब
उसी ने आज हमसे भी  बड़ी  झूठी कसम कर ली।'

इस शैर का भाव स्पष्ट नहीं है ।

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