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1-
जन्मों तक होता नहीं, यात्राओं का अंत।
सभी सफर में हैं यहाँ,सुर नर संत महंत।।
सुर नर संत महंत, जन्म जिसने भी पाया।
पंचतत्व की एक, मिली सबको ही काया।।
मन में ईर्ष्या द्वेष, लिए अवसर जो खोता।
यात्रा में वह जीव, अस्तु जन्मों तक होता।।
2-
यात्रा का वर्णन करूँ, या फिर लिखूँ पड़ाव।
लिख दूँ सभी उतार भी, या फिर सिर्फ चढ़ाव।।
या फिर सिर्फ चढ़ाव, लिखूँगा विवरण पूरे।
कार्य हुए जो पूर्ण, और जो रहे अधूरे।।
हानि-लाभ सुख-दुक्ख, बराबर सबकी मात्रा।
यश-अपयश उपलब्धि, यही है जीवन यात्रा।।
3-
रोचक लगता है सदा, यात्रा का वृत्तांत।
पर अंतिम यात्रा सदा, देती शांति नितांत।।
देती शाति नितांत, मुक्ति जीवन से देती।
सारे दुख संताप, मृत्यु सबके हर लेती।।
जीते जी यह जीव, स्वार्थवश खुद को ठगता।
पापकर्म का मार्ग, उसे तब रोचक लगता।।

4.

होगी सन उन्नीस में, सत्ता किसके पास।
सभी दलों का जोर है, इसी बात पर खास।।
इसी बात पर खास, अभी गठबंधन जारी।
मूल्य और सिद्धांत, सभी पर कुर्सी भारी।।
योगी और गृहस्थ, सभी कुर्सी के रोगी।
कुर्सी केवल एक, न जाने किसकी होगी।।
(मौलिक व अप्रकाशित)
**हरिओम श्रीवास्तव**

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Comment by Samar kabeer on January 28, 2019 at 10:53am

जनाब हरिओम श्रीवास्तव जी आदाब,अच्छे कुण्डलिया छन्द लिखे आपने,बधाई स्वीकार करें ।

कृपया ध्यान दे...

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