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क्या मन है बीमार पड़ौसी - गजल - लक्ष्मण धामी "मुसाफिर"

२२२२/२२२२


खाता क्यों है खार पड़ौसी
क्या मन है बीमार पड़ौसी।१।


इतनी जल्दी भूल गया क्यों
बचपन के हम यार पड़ौसी।२।


सच जाने पर खूब करे क्यों
बेमतलब  तकरार  पड़ौसी।३।


जो कहना है सम्मुख कह दे
मत कर  पीछे  वार पड़ौसी।४।


जबरन हम तो नहीं घुसेंगे
क्यों ढकता है द्वार पड़ौसी।५।


लड़ना भिड़ना पागलपन है
इसमें सब की हार पड़ौसी।६।


तुझको दुनिया जान गयी है
मत बन तू हुशियार पड़ौसी।७।


सदियों  से  कश्मीर  हमारा
तेरा क्या अधिकार पड़ौसी।८।


नफरत  इतनी  ठीक नहीं है
बाँटा कर कुछ प्यार पड़ौसी।९।


मौलिक/अप्रकाशित
लक्ष्मण धामी "मुसाफिर"

Views: 920

Comment

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Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on September 19, 2018 at 7:15pm

आ. भाई अजय कुमार जी, गजल पर उपस्थिति और उत्साहवर्धन के लिए धन्यवाद ।

Comment by Ajay Kumar Sharma on September 19, 2018 at 6:49pm

मन को आनन्दित करती बहुत ही सुन्दर रचना...

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on September 19, 2018 at 6:06pm

आ. भाई अजय जी, सादर अभिवादन । आपकी उपस्थिति से मन आस्वस्थ हुआ। स्नेह के लिए आभार ।

Comment by Ajay Tiwari on September 19, 2018 at 5:52pm

आदरणीय लक्ष्मण जी, अच्छी ग़ज़ल हुई है. हर्दिकं बधाई .

लड़ना भिड़ना पागलपन है
इसमें सब की हार पड़ौसी

सादगी से कहा गया बहुत अच्छा शेर है. 

सादर 

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on September 19, 2018 at 12:48pm

आ. भाई तेजवीर जी, गजल पर उपस्थिति और उत्साहवर्धन के लिए आभार ।

Comment by TEJ VEER SINGH on September 19, 2018 at 12:03pm

हार्दिक बधाई आदरणीय लक्ष्मण धामी "मुसाफिर"जी। बेहतरीन गज़ल।

नफरत  इतनी  ठीक नहीं है
बाँटा कर कुछ प्यार पड़ौसी।९।

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