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लट जाते हैं पेड़- एक गीत

राह किसी की कहाँ रोकते,

हट जाते हैं पेड़

इसकी, उसकी, सबकी खातिर,

कट जाते हैं पेड़

 

तपन धूप की खुद सह लेते

देते सबको शीतल छाया.

पत्ते, छाल, तना, जड़, सब कुछ,

लुटा रहे हैं पूरी काया.

 

पत्थर भी सह, फल देने को,

पट जाते हैं पेड़.  

 

किसने रोपा किसने पाला,

कोई भी खाता कब रखते.

पात झरे, शाखाएँ टूटी,

सहा सभी कुछ हँसते हँसते.

 

उठें सहन में दीवारें, सँग,

सट जाते हैं पेड़.

होते फूल और फल कम जब,

सबके मन को कहाँ सुहाते.

साथ उम्र के बढती मुश्किल,

साँस नहीं खुल कर ले पाते.  

 

कंकरीट में कैदी होकर,

लट जाते हैं पेड़

"मौलिक एवं अप्रकाशित"

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Comment by बसंत कुमार शर्मा on June 26, 2018 at 5:37pm

आदरणीया Anamika singh Ana जी हृदय से आभार आपका 

Comment by बसंत कुमार शर्मा on June 26, 2018 at 4:05pm

आदरणीय बृजेश कुमार 'ब्रज' जी हृदय से आभार आपका 

Comment by Anamika singh Ana on June 22, 2018 at 6:45pm

वाह. ! वृक्षों की विचारणीय परिदृश्य  पर बेहद सुंदर गीत रचा है आदरणीय बसंत कुमार शर्मा  जी...हार्दिक  बधाई स्वीकारें , सादर 

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on June 22, 2018 at 11:21am

वाह आदरणीय बहुत ही सुन्दर साथक गीत...बधाई

Comment by बसंत कुमार शर्मा on June 21, 2018 at 8:57pm

आदरणीय लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' जी आपका दिल से शुक्रिया 

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on June 21, 2018 at 8:18pm

सुंदर रचना,  हार्दिक बधाई , आ. भाई बसंत जी ।

Comment by बसंत कुमार शर्मा on June 21, 2018 at 4:03pm

आदरणीय TEJ VEER SINGH जी हृदय तल से आभार आपका

Comment by TEJ VEER SINGH on June 21, 2018 at 3:55pm

हार्दिक बधाई आदरणीय बसंत कुमार जी।बेहतरीन कविता।

Comment by बसंत कुमार शर्मा on June 21, 2018 at 12:36pm

आदरणीया babitagupta  जी हृदय तल से आभार आपका

Comment by बसंत कुमार शर्मा on June 21, 2018 at 12:36pm

आदरणीया Neelam Upadhyaya  जी हृदय तल से आभार आपका , जी अवश्य , सुधार कर रहा हूँ 

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