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जिन्दगी थोड़ा ठहर जाओ
जरा धीरे चलो
तेज इस रफ्तार से 
घात से प्रतिघात से 
वक्त रहते , सम्भल जाओ
जरा धीरे चलो
जिन्दगी - - - -
कामना के ज्वार में
मान के अधिभार में
डूबने से बच , उबर जाओ
जरा धीरे चलो
जिन्दगी - - - -
शब्दाडम्बरों के
उत्तरों प्रत्युत्तरों के
जाल से बच कर , निकल जाओ 
जरा धीरे चलो
जिन्दगी - - - -

(मौलिक एवम अप्रकाशित)

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Comment

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Comment by Usha Awasthi on June 15, 2018 at 10:10pm

आभार रक्षिता जी।

Comment by रक्षिता सिंह on June 15, 2018 at 2:56pm

आदरणीया ऊषा जी, नमस्कार
बहुत सुन्दर पंक्तियाँ ....हार्दिक बधाई स्वीकार करें ।

Comment by Usha Awasthi on June 13, 2018 at 9:09pm

आभार महेन्द्र जी।

Comment by Mahendra Kumar on June 13, 2018 at 7:55pm

//तेज इस रफ्तार से 
घात से प्रतिघात से 
वक्त रहते , सम्भल जाओ
जरा धीरे चलो//

इस बढ़िया प्रस्तुति पर हार्दिक बधाई स्वीकार कीजिए आदरणीया उषा अवस्थी जी. सादर. 

Comment by Usha Awasthi on June 13, 2018 at 5:00pm

धन्यवाद नीलम जी।

Comment by Neelam Upadhyaya on June 13, 2018 at 4:50pm

आदरणीया उषा अवस्थी जी, नमस्कार । सुंदर भावपूर्ण रचना के लिए हार्दिक बधाई ।

Comment by बसंत कुमार शर्मा on June 13, 2018 at 3:23pm

सुंदर भाव पूर्ण सृजन 

Comment by Usha Awasthi on June 13, 2018 at 2:27pm

धन्यवाद आपका बसंत कुमार जी।

Comment by बसंत कुमार शर्मा on June 13, 2018 at 1:34pm

सुंदर भाव पूर्ण सृजन 

Comment by Usha Awasthi on June 13, 2018 at 12:04pm

 आभार आपका श्याम नारायण जी।

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