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कविता --हाँ, हमें अभी और देखना है

हाँ , हमें अभी और देखना है
टूटते शहर का मंज़र
रिश्तों में उलझी संवेदनहीनता का दंश
अपनों के बीच परायेपन का अहसास
घुट घुटकर रोज़ मरना
पीढ़ियों के अंतर की गहरी खाई में गिरना
निर्मम व्यवस्था का शिकार होना
हाँ, हमें अभी और देखना है
लालच का उफनता समुद्र
अकेलेपन के चुभते काँटें
बीमार बाप के लरजते हाथ
झुर्रियों की ख़ामोशियाँ
बेचैन माँ की प्रतीक्षा
कर्कश तरंगों का शोर
विघटन की शैतानी लकीरें
भरोसे में लालच के दैत्य
ठहरा आत्मविश्वास
आवारा विचारों की श्रृंखलाएँ
समृद्धि की चिलचिलाती धूप
हाँ, हमें अभी और देखना है
हम सबको मिल बाँटकर सहना है ।

मौलिक एवं अप्रकाशित ।

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Comment

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Comment by Mohammed Arif on June 12, 2018 at 8:47am

हार्दिक आभार आदरणीया नीलम उपाध्याय जी ।

Comment by Mohammed Arif on June 11, 2018 at 8:07am

हार्दिक आभार आदरणीय विजय निकोर जी ।

Comment by vijay nikore on June 11, 2018 at 7:01am

इस शीर्षक में ही कमाल की सच्चाई है,और रचना तो बस पढ़ते ही बनर्ती है। बधाई, भाई मोहम्मद आरिफ़ जी।

Comment by Mohammed Arif on June 10, 2018 at 10:57pm

हार्दिक आभार आदरणीय मोहित मिश्रा जी ।

Comment by Mohammed Arif on June 9, 2018 at 6:40pm

हार्दिक आभार आदरणीय बृजेश कुमार जी ।

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on June 9, 2018 at 2:59pm

हाँ हमें और देखना है...आदरणीय आरिफ जी बहुत ही खूब लिखा वाह

Comment by Mohammed Arif on June 8, 2018 at 6:54pm

रचना पर अपनी अमूल्य राय साझा करने का बहुत-बहुत शुक्रिया आदरणीय गुमनाम जी ।

Comment by Mohammed Arif on June 8, 2018 at 6:52pm

रचना पर अपनी अमूल्य राय साझा करने का बहुत -बहुत शुक्रिया आदरणीया रक्षिता जी ।

Comment by gumnaam pithoragarhi on June 8, 2018 at 1:33pm

वाह अच्छी कविता स्थितियों का सही चित्रण......

Comment by रक्षिता सिंह on June 8, 2018 at 12:55pm

आदरणीय आरिफ जी नमस्कार,

आज के युग में चारों तरफ जो अशांति....का मंज़र है, आपने उसे अपनी कविता के माध्यम से बड़ी ही गहराई से बयां किया है.....बहुत ही बेहतरीन कविता, मुबारकबाद क़ुबूल करें ।

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