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सब कहते हैं शहर में भी सहर होता है
पर शहर में बसर कहाँ बशर होता है

दूर दूर जहाँ तक नज़र जाती है
धुँआ धुँआ शहर ये ज़हर ढोता है

दाग़ ग़ालिब का ये जो पुराना शहर है
बात बात में गालियों का हर्जाना भरे है

क्या हो गया है इस नए ज़माना ए नस्ल को
रिश्तों को सरेआम सरेबाज़ार करे हैं

शब ओ सहर ए उजाला ए फ़साना
शहर ए ग़म की कहानी कहे है

क्या कहूँ अब किस्सा ज़िंदगी का
सब अपनी अपनी कहानी कहे हैं

"मौलिक एवं अप्रकाशित"

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Comment

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Comment by Dr Ashutosh Mishra on November 13, 2017 at 5:13pm

आदरणीया अनामिका जी इस मंच पर आपका हार्दिक स्वागत करता हूँ आदरणीय आरिफ जी की बातो का संज्ञान लें ...सादर 

Comment by SALIM RAZA REWA on November 13, 2017 at 4:51pm
मोहतरमा अनामिका जी,
सुंदर प्रयास के लिए बधाई,
Comment by Dr Ashutosh Mishra on November 13, 2017 at 2:50pm

आदरणीया अनामिका जी इस मंच पर आपका हार्दिक स्वागत करता हूँ आदरणीय आरिफ जी की बातो का संज्ञान लें ...सादर 

Comment by Samar kabeer on November 13, 2017 at 2:41pm
मोहतरमा अनामिका जी आदाब,शायद आपने ग़ज़ल लिखने का प्रयास किया है,लेकिन अभी आपको ग़ज़ल विधा के बारे में बहुत अध्यन करना होगा,इसके लिए इस मंच पर ग़ज़ल की कक्षा का लाभ उठायें ।
इस प्रयास पर बधाई आपको ।
Comment by Mohammed Arif on November 12, 2017 at 12:04pm
आदरणीया अनामिका जी आदाब,
ओबीओ मंच पर मैं आपकी यह पहली रचना से संवाद कर रहा हूँ । सबसे पहले आपका हार्दिक अभिनंदन । आपकी उक्त रचना किस विधान के अंतर्गत आती है यह आपने ऊपर दर्शाया नहीं है । इस मंच का नियम है कि रचना के साथ उसका विधान भी लिखना अनिवार्य होता है । पटल पर प्रस्तुति पर हार्दिक बधाई स्वीकार करें । बाक़ी गुणीजन अपनी राय देंगे, इंतज़ार करें ।

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