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ग़ज़ल - बेसबब यूँ ही नही परदा करो

2122 2122 212
इस तरह बे फिक्र मत निकला करो ।
कुछ ज़माने को भी अब समझा करो।।

लोग पलकें हैं बिछाए राह में ।
बेसबब यूँ ही नहीं परदा करो ।।

है मुहब्बत से सभी की दुश्मनी।
ज़ालिमों से मत कभी उलझा करो ।।

फिर सितारे टूटकर गिरते मिले ।
आसमा पर भी नज़र रक्खा करो ।।

कुछ परिंदे हो गए बेख़ौफ़ हैं ।
कौन कैसा उड़ रहा देखा करो ।।

दाग दामन पर लगे कितने यहां ।
आइनो से भी कभी पूछा करो ।।

वक्तपर अक्सर मुकर जाते हैं लोग ।
आदमी की बात को परखा करो ।।

याद रखना है अगर उसका सितम ।
दिल के पन्नों में सितम लिक्खा करो।।

है अगर कुछ भी सुकूँ से वास्ता ।
जुर्म के बाबत नहीं चर्चा करो ।।

हम यकीं करने लगेंगे आप पर ।
आप मुद्दों पर कभी ठहरा करो ।।

लुट न जाए यह खज़ाना हुस्न का ।
उम्र की दहलीज पर पहरा करो ।।

नावीन मणि त्रिपाठी
मौलिक अप्रकाशित

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Comment by Mohammed Arif on September 23, 2017 at 10:18am
आदरणीय नवीन मणि त्रिपाठी जी आदाब, बहुत ही अच्छे अश'आर । शे'र दर शे'र दाद के साथ मुबारकबाद क़ुबूल कीजिए । बाक़ी गुणीजन अपनी राय देंगे ।

कृपया ध्यान दे...

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