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तू  दर्द से मिलें  हो ये  दौलत  कहाँ कहाँ                     

रहती है प्यार को  भी  शिकायत कहाँ कहाँ

             

दुनिया  बदल  गई  कोई हमको  बता गया                    

मिलती है बोल सोच कि वहशत कहाँ  कहाँ

             

जब  अब   बहा र हो न  हमारे  नसीब  में                   

फिर और  हम बता दो तिजारत कहाँ कहाँ

                    

हम भी तलाश हार  गये  जो     मिला नहीं                   

पाने    को  उस करी न  इबादत कहाँ कहाँ      

             

कैसे    कहें     सदा  वो  हमारे  बनें    रहे                 

है  अब पता चला कि सियासत कहाँ  कहाँ   

             

हम जिंदगी कि रंग मनाने को चल पड़े                 

"ये गम कहाँ कहाँ ये मसर्रत कहाँ कहाँ "

 "मौलिक व अप्रकाशित"

             

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Comment by Samar kabeer on July 31, 2017 at 6:16pm
जनाब डॉ.मोहन बेगोवाल जी आदाब,ग़ज़ल का प्रयास अच्छा है,बधाई स्वीकार करें,ग़ज़ल अभी बहुत समय चाहती है,आपको चाहिए कि ग़ज़ल के विषय में मंच पर मौजूद आलेखों का अध्यन करें ।

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