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निकलते अब पहाड़ों के सुरों से दर्द के नाले (ग़ज़ल 'राज'

१२२२   १२२२   १२२२   १२२२

कहीं मलबा कहीं पत्थर कहीं मकड़ी के हैं जाले

कहानी गाँव  की कहते घरों के आज ये ताले  

 

किया बर्बाद मौसम ने छुड़ाया गाँव घर आँगन

यहाँ दिन रात रिसते हैं दिलों में गम के ये छाले

 

भटकते शह्र में फिरते मिले दो वक्त की रोटी

सिसकते गाँव के चूल्हे तड़पते दीप के आले*

 

कहाँ संगीत झरनों के परिंदों की कहाँ चहकन 

निकलते अब  पहाड़ों के सुरों से  दर्द के नाले

 

लुटा सुख चैन सब अपना कहें किससे कहाँ जाएं 

उधर वो  चीखते पर्वत इधर चुप ये जहाँ  वाले

 

 कहीं सौगात खुशियों की मिले उनसे किसानों को 

 सहम जाते पहाड़ों पर घिरें बादल जहाँ काले

 

फकत  मजबूरियाँ अपनी कलेजों पर धरे पत्थर

उसी को छोड़ना पड़ता हमें जिस गोद ने पाले

आले*=दीपक रखने का स्थान ,नाले=आहें ,पाले=पालन पोषण किया 

----मौलिक एवं अप्रकाशित 

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Comment by Mahendra Kumar on July 12, 2017 at 9:37pm

आ. राजेश मैम, अच्छी ग़ज़ल हुई है. मेरी तरफ़ से हार्दिक बधाई स्वीकार कीजिए. आ. समर सर की बातों से मैं भी पूर्णतः सहमत हूँ. उनकी टिप्पणी से मुझे भी बहुत कुछ सीखने को मिला. इसके लिए मैं उनको हृदय से धन्यवाद देता हूँ. सादर.

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on July 10, 2017 at 9:32pm

आ० दीदी . बड़े बड़े लोग बहुत कुछ कह गए . आखिरी  शेर से मैं भी मायूस हूँ आपका  अभिप्राय तो समझ मे आता है पर ----हमें जिस गोद ने पाले-----आपको भी खटकता होगा  शायद -----ससम्मान .


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on July 10, 2017 at 8:56am

आद० गिरिराज जी ,गजल पर उपस्थिति व् बधाई के लिए दिल से आभारी हूँ बहुत बहुत शुक्रिया | मुझे कुछ शब्दों के विषय में लिख देना चाहिए था वो मेरी गलती हुई है 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on July 10, 2017 at 8:54am

आद० समर भाई जी ,आपकी बातें शत प्रतिशत सही हैं आपके अंदाज में कहे मिसरे और परिष्कृत हो गए हैं हमें एक आयोजन में तुरत फुरत पहाड़ों के दर्द  पर कुछ लिखने के लिए दिया गया था ये ग़ज़ल उस वक़्त का परिणाम है इसे आशु भी कह सकते हैं इसमें आपकी  इस्स्लाह के अनुसार सुधार कर लूँगी मुझे कुछ शब्दों के अर्थ पहले लिख देने चाहिए थे ये मेरी गलती रही है | मार्ग दर्शन के लिए तहे दिल से शुक्रगुजार हूँ भाई जी |


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on July 10, 2017 at 8:37am

आदरनीया राजेश की , ग़ज़ल ले किये आपको हार्दिक बधाइयाँ .. आ, समर भाई जी की सलाह उचित है , गौर कीजियेगा । आँचलिक शब्द का निषेध नही है पर उसका अर्थ दे दिया जाना ज़रूरी होता है क्यों कि ये शब्द किसी अँचल विशेष मे प्रचलित होते हैं । वैसे हमारे छत्तीस गढ मे भी आला प्रचलित शब्द है ।

Comment by Samar kabeer on July 9, 2017 at 10:13pm
बहना, ग़ज़ल का मुआमला ये है कि ग़ज़ल का अर्थ पाठक अपनी सोच के हिसाब से निकालता है,शाइर हर पाठक के सामने अशआर की तशरीह करने नहीं जा सकता,ये जो आपका स्पष्टीकरण है, इससे आप तो मुतमइन हो सकती हैं लेकिन पाठक नहीं,आपकी ग़ज़ल का मतला इसी भाव के साथ मैं कहता तो यूँ कहता:-
'कहीं मलबा,कहीं पत्थर,कहीं मकड़ी के हैं जाले
लगे हैं गाँव के हर घर में बोलो किसलिये ताले'

दूसरा शैर यूँ होता:-
'किया बर्बाद मौसम ने छुड़ाया गाँव, घर,आंगन
हमारी दास्ताँ कहते हैं देखो दिल के ये छाले'
ये मैंने अभी इसी वक़्त कहे हैं,शिल्प की दृष्टि से इन्हें और बहतर किया जा सकता हैं लेकिन फिलहाल मिसाल के लिये पेश कर दिए ताकि आप मेरे कहे के मर्म को समझ सकें,मैं अच्छी तरह जानता हूँ कि अभी आप देहरादून के आयोजन को लेकर बहुत मसरूफ़ होंगी इसलिये ग़ज़ल पर जो समय देना चाहिए था वो नहीं दे सकीं ।
अब रहा आंचलिक शब्द,तो इसके बारे में सिर्फ़ इतना अर्ज़ करूँगा कि ग़ज़ल का मिज़ाज इनके इस्तेमाल की इजाज़त नहीं देता,ये छन्द में ही अच्छे लगते हैं,और अगर इनका इस्तेमाल करना ही पड़ जाये तो इसका बहतर तरीक़ा ये है कि इसका इज़हार पहले ही कर दिया जाये,उम्मीद है आप मेरी बात समझ रही होंगी ।

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on July 9, 2017 at 7:41pm

आद० समर भाई जी ,मुझे अफ़सोस है की ये ग़ज़ल आपको संतुष्ट नहीं कर सकी फिर भी अपनी बात स्पष्ट करुँगी 

यहाँ गाँव के ताले से मेरा मतलब पूरे गाँव में ताले अर्थात लॉक से है घरों में लॉक लगाकर पहाड़ों से  नीचे भाग आये हैं लोग वो ताले गाँव के तन्हाई की कहानी लिख रहे हैं | गोद ने पाले का मतलब जिस गोद ने पालन पोषण किया पहाड़ों की गोद |दीप के आले -मतलब गाँव  में दीवार में जहाँ दीप रखते हैं वहां जो जगह बनाते हैं उसे आले कहते हैं ये एक आंचलिक शब्द है इनके अलावा इस काफिये में मुझे और उपयुक्त शब्द नहीं मिल सके बहुत साधारण बोल चल वाले शब्द ही इस्तेमाल कर  पाई हूँ 

यहाँ दिन रात रिसते हैं सभी के दर्द के छाले----पहाड़ों से घर बार छोड़ ने पर जो दिल पर घाव हुए हैं उन्हें छालों का बिम्ब देकर कहने की कोशिश की है  


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on July 9, 2017 at 7:34pm

आद० रवि भैया ,आपका बहुत बहुत शुक्रिया | यहाँ गाँव के ताले से मेरा मतलब पूरे गाँव में ताले अर्थात लॉक से है घरों में लॉक लगाकर पहाड़ों से  नीचे भाग आये हैं लोग वो ताले गाँव के तन्हाई की कहानी लिख रहे हैं | गोद ने पाले का मतलब जिस गोद ने पालन पोषण किया पहाड़ों की गोद |दीप के आले -मतलब गाँव  में दीवार में जहाँ दीप रखते हैं वहां जो जगह बनाते हैं उसे आले कहते हैं ये एक आंचलिक शब्द है | मेरे ख्याल से तो कोई शब्द एसा नहीं जो अपनी बात स्पष्ट नहीं कर रहा हो | 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on July 9, 2017 at 7:28pm

बृजेश कुमार जी आपको ग़ज़ल पसंद आई आपका बहुत बहुत शुक्रिया 

Comment by Samar kabeer on July 9, 2017 at 7:14pm
बहन राजेश कुमारी जी आदाब,ग़ज़ल का प्रयास अच्छा हुआ है,दाद के साथ मुबारकबाद पेश करता हूँ ।
मतले के सानी मिसरे में 'ताले'क़ाफ़िया भर्ती का है ।
दूसरे शैर में 'दर्द के छाले'कैसे होते हैं ?
तीसरे शैर में 'डीप के आले' क्या मतलब ?
चौथे शैर में 'पहाड़ों के सुर'कैसे होते हैं ?
पांचवें शैर में 'पर्वत'भी इसी जहाँ का हिस्सा तो हैं ।
छटा शैर शिल्प की दृष्टि से बहुत कमज़ोर है ।
आख़री शैर भी शिल्प की दृष्टि से बहुत कमज़ोर है ।
कुल मिलाकर ऐसा लगता है कि ये ग़ज़ल आपने जल्दबाज़ी में कही है ।

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