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तिनका लेकर चौंच में, मन में भर उल्लास
बया बनाती घोंसला, जग में सबसे ख़ास

इक बबूल के पेड़ पर, बसा बया का गाँव
भरी दोपहर में मिले, उसको ठंडी छाँव

छन छन कर आती हवा, नहीं धूप का काम
मई जून में कर रही, बया वहाँ आराम

गर्मी, सर्दी, बारिशें, हो आँधी तूफ़ान
सदा बया का घोंसला, रहता सीना तान
मौलिक एवं अप्रकाशित

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Comment by बसंत कुमार शर्मा on May 24, 2017 at 8:40pm

आदरणीय Mohammed Arif जी आपकी हौसला अफजाई के लिए ह्रदय से आभार 

Comment by बसंत कुमार शर्मा on May 24, 2017 at 8:40pm

आदरणीय Shyam Narain Verma जी आपकी प्रथम प्रतिक्रिया का  ह्रदय से आभार 

Comment by Mohammed Arif on May 24, 2017 at 7:06pm
आदरणीय बसंत शर्मा जी आदाब,बहुत ही सुंदर दोहों की रचना हुई है । पर्यावरणीय संवेदना और सूक्ष्म दृष्टि का भाव निरूपण भी । हार्दिक बधाई स्वीकार करें ।
Comment by Shyam Narain Verma on May 24, 2017 at 3:02pm
सुंदर भाव से संजोयी रचना पर बधाई स्वीकारें

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