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जन-मन भावना (लघुकथा) /शेख़ शहज़ाद उस्मानी

"अरे, हामिद, हेमंत, हरिया और हरवीर .. तुम सब ये तिरंगे लेकर यूँ कहाँ जा रहे हो यहाँ से?" खेत की मेड़ पर दौड़ रहे बच्चों से रामदीन ने चिल्लाकर पूछा।

बच्चे दौड़ते हुए ही क्रमशः बोले-

"नेताजी का स्वागत करने!"
"सुना है वे बच्चों की सुनते हैं!"
"आज हम अपने मन की बातें कह कर रहेंगे उनसे!"

यह सुनकर मुस्कराते हुए रामदीन ने कहा- "लेकिन सड़क से जाओ न! मंच के पास पहुंचो!"

"चाचा, वहां पुलिस लगी है ,भगा देंगे हमें!" हामिद ने तिरंगा संभालते हुए कहा।

"हम गांव में नेताजी के घुसते ही उनसे मिलेंगे, वे हमें देखते ही कार रुकवा देंगे!" हेमंत बोला।

हरिया रुकते हुए बोला- "चाचा, दादा जी ने इनको बहुत समझाया, लेकिन ये हमें भी ज़बरदस्ती ले जा रहे हैं!"

"नेताजी की बातों का असर है बेटा, सच्चाई समझ लेने दो इनको भी!" रामदीन ने अपने हँसिया-खुरपी संभालते हुए कहा और साथियों के साथ खेत में काम पर जुट गया।

(मौलिक व अप्रकाशित)

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Comment by Sheikh Shahzad Usmani on February 4, 2017 at 8:07pm
यहाँ भी वक्त देकर हौसला अफ़जा़ई के लिए बहुत बहुत शुक्रिया मोहतरम जनाब मोहम्मद आरिफ साहब।
Comment by Mohammed Arif on February 1, 2017 at 5:07pm
आदरणीय शेख शहज़ादजी, अच्छी लघुकथा । बधाई स्वीकार करें ।

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