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ग़ज़ल- इसे जुल्म में न शुमार कर

11212 11212 11212 11212
है नई नई ये मेंरी ख़ता इसे जुल्म में न शुमार कर ।
है जो आशिकी का ये दौर अब इसे इस तरह न तू ख्वार कर ।।

उसे जिंदगी से नफ़ा मिला मुझे दर्द का है सिला मिला ।
ये हिसाब अब न दिखा मुझे न तिजारतों में दरार कर ।।

वो हवा चली ही नहीं कभी वो दरख़्त को न नसीब थी ।
मेरे फ़िक्र की है ये आरज़ू तू इसी चमन में बहार कर ।।

यहाँ चाहतों में है दम कहाँ कई चाहतें भी दफ़ा हुईं ।
है मुहब्बतों का सवाल ये कहीं जिंदगी को निसार कर ।।

हमें पत्थरों सा है दिल मिला मेरे दर्द की है न इंतिहा ।
न ठहर ठहर के तू वार कर हमें गम न कोई उधार कर ।।

तेरी आसमा पे नज़र गई तेरी हसरतें भी बदल गईं ।
है उड़ान की तेरी ख्वाहिशें तो कफ़स से खुद को फरार कर ।।

सारी उल्फतों में हैं दौलतें तेरा रूह से है न वास्ता ।
तेरे हौसलों में है दम अगर मेरे गर्दिशों से करार कर ।।

ये जो आंसुओ के निशान हैं न छुपा के चल तू नकाब में ।
तुझे पढ़ लिया हूँ मैं गौर से यूँ तमाम रात गुज़ार कर ।।

--नवीन मणि त्रिपाठी
मौलिक अप्रकाशित

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Comment by Mohammed Arif on January 27, 2017 at 8:11am
आदरणीय नवीन मणि त्रिपाठीजी,अच्छी ग़ज़ल । बधाई स्वीकार करें ।

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on January 26, 2017 at 9:59pm

आदरणीय नवीन मणि त्रिपाठी जी, बढ़िया ग़ज़ल कही है आपने. शेर-दर-शेर दाद के साथ मुबारकबाद कुबूल फरमाएं. आदरणीय समर कबीर जी की इस्लाह तो मिल ही गई है. सादर 

Comment by Samar kabeer on January 26, 2017 at 7:08pm
जनाब नवीन मणि त्रिपाठी जी आदाब,अच्छी ग़ज़ल हुई है,दाद के साथ मुबारकबाद पेश करता हूँ ।
मतले के ऊला मिसरे में ऐब-ए-तनाफ़ुर देखिये 'ज़ुल्म में' ।
तीसरे शैर में ऐब-ए-तनाफ़ुर देखिये ' न नसीब' ।
पांचवें शैर में शुतरगुर्बा दोष है,'हमें'और 'मेरे' ।
सातवें शैर के सानी में 'मेरे गर्दिशों'को "मेरी गर्दिशों'करें, "गर्दिश'स्त्रीलिंग है ।
और हाँ,तीसरे शैर के सानी में 'मेरे फ़िक्र'को "मेरी फ़िक्र"कर लें,फ़िक्र स्त्रीलिंग है ।
Comment by Dr Ashutosh Mishra on January 26, 2017 at 11:43am

आदरणीय नवीन मणि जी ..इस ग़ज़ल पर और गणतंत्र दिवस पर हार्दिक शुभकामनायें स्वीकारे करें सादर 

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