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तुम्ही बता दो कैसे आऊँ - (गीत) - मिथिलेश वामनकर

तुम्ही कहो, कैसे आऊँ,

सब छोड़ तुम्हारे पास प्रिये?

 

एक कृषक कल तक थे लेकिन अब शहरी मजदूर बने।

सृजक जगत के कहलाते थे, वो कैसे मजबूर बने?

वे बतलाते जीवन गाथा, पीड़ा से घिर जाता हूँ।

कितने दुख संत्रास सहे हैं, ये लिख दूँ, फिर आता हूँ।

कर्तव्यों के नव बंधन को तोड़ तुम्हारे पास प्रिये,

तुम्ही कहो, कैसे आऊँ,

सब छोड़ तुम्हारे पास प्रिये?

 

कौन दिशा में कितने पग अब कैसे-कैसे है चलना?

अर्थजगत के नए मंच पर, कैसे या कितना ढलना?

तथ्य अधूरे समझ सका पर पूर्ण उन्हें समझाना है।

छोड़ अधूरे काम प्रिये अब आना भी क्या आना है?

आज बताये उन रस्तों को मोड़ तुम्हारे पास प्रिये,

तुम्ही कहो, कैसे आऊँ,

सब छोड़ तुम्हारे पास प्रिये?

 

खेतों की हरियाली का नूतन कर्तव्य निभाना है।

अन्न दान करते हैं जो अब उनका कर्ज चुकाना है।

अम्बरीश मैं, निकट खड़ा हर एक लगे दुर्वासा है।

तन पूरित है मेरा लेकिन मन प्यासा का प्यासा है।

तन के ताने-बाने की बस होड़ तुम्हारे पास प्रिये,

तुम्ही कहो, कैसे आऊँ,

सब छोड़ तुम्हारे पास प्रिये?

 

व्यस्त जगत है अपने में ही, किसको है अवकाश यहाँ?

भूखे प्यासे बेघर निर्धन, अब तक सिर्फ हताश यहाँ।

प्यार मुहब्बत और दिलासा ना पाई है आस कभी ।

खुशियाँ, सुख के क्षण क्या होते? इनसे हैं अनजान सभी।

इक रिश्ते का कम से कम गठजोड़ तुम्हारे पास प्रिये,

तुम्ही कहो, कैसे आऊँ,

सब छोड़ तुम्हारे पास प्रिये?

 

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(मौलिक व अप्रकाशित)  © मिथिलेश वामनकर 
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सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on February 1, 2017 at 12:55am

आदरणीय नरेन्द्र सिंह जी, सराहना हेतु हार्दिक आभार आपका. सादर 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on February 1, 2017 at 12:55am

आदरणीय पंकज जी, सराहना हेतु हार्दिक आभार. सादर 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on February 1, 2017 at 12:54am

आदरणीय कालीपद प्रसाद जी, गीत की सराहना हेतु हार्दिक आभार. सादर 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on February 1, 2017 at 12:54am

आदरणीया राजेश दीदी, गीत आपको पसंद आया, जानकार ख़ुशी हुई. सराहना एवं मार्गदर्शन हेतु हार्दिक आभार. आपने बहुत बढ़िया मुखड़ा सुझाया है लेकिन तुकांतता 'ओड़' निर्धारित  है अतः 'आस' तुकांत वाला मुखड़ा रखना उचित नहीं होगा. सादर 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on February 1, 2017 at 12:52am

आदरणीय मोहम्मद आरिफ़ जी, सराहना हेतु हार्दिक आभार. सादर 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on February 1, 2017 at 12:52am

आदरणीय गिरिराज सर, गीत पसंद करने एवं मार्गदर्शन के लिए हार्दिक आभार. आपने बहुत बढ़िया मुखड़ा सुझाया है लेकिन तुकांतता 'ओड़' निर्धारित  है अतः 'आस' तुकांत वाला मुखड़ा रखना उचित नहीं होगा. सादर 

Comment by narendrasinh chauhan on January 31, 2017 at 2:02pm

बहुत सुन्दर

Comment by Samar kabeer on January 30, 2017 at 4:07pm
जनाब मिथिलेश वामनकर जी आदाब,एक बात तो ये कि मेरे बेटे को ओबीओ पर चेटिंग नहीं आती,इसके लिये क्षमा चाहता हूँ ।
आपके गीत को कई बार सुन चुका हूँ,मुखड़ा तो आप ठीक कर ही चुके हैं,'अम्बरीश'वाली पंक्ति भी सही हो गई है,अनुस्वार के बारे में पहले ही कह चुका हूँ कि पहले बन्द में 'बनें' के स्थान पर "बने"होना चाहिये,इसके अलावा मुझे और कोई त्रुटि नज़र नहीं आ रही है,हो सकता है ये मेरी कम नज़री हो,मुझे तो बाक़ी की सभी पंक्तियां अच्छी और ठीक लग रही है,जिसके लिये आपको पुनः बधाई देता हूँ ।
Comment by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on January 29, 2017 at 4:40pm
आदरणीय मिथिलेश सर सुन्दर गीत के लिए बधाइयाँ
Comment by Kalipad Prasad Mandal on January 29, 2017 at 4:32pm

आदरणीय मिथिलेश वामनकर जी ,सभी वंद बहुत सुन्दर हुए है | मुखड़े बारे में तो चर्चा विद्वानों के किया ही  है |हार्दिक बधाई |

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