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ग़ज़ल (नया नग्मा कोई गाओ)

1 2 2 2     1 2 2 2

नया नग्मा कोई गाओ

पुराने ग़म चले आओ

तुम्हें उड़ना सिखा दूँगा

मिरे पिंजड़े में आ जाओ

अकेलापन अगर अखड़े

उदासी को बुला लाओ

अरे भँवरे, अरी चिड़िया

ग़ज़ल कोई सुना जाओ

शजर बोला परिंदे से

मुहाजिर लौट भी आओ

हमारा दिल तुम्हारा घर

कभी आओ, कभी जाओ

 

मौलिक और अप्रकाशित

...दीपक कुमार

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Comment by जयनित कुमार मेहता on January 20, 2017 at 5:27am
आदरणीय दीपक जी, सर्वप्रथम अच्छी ग़ज़ल के लिए हार्दिक बधाई आपको। आदरणीय समर कबीर जी इस मंच से पुराने तथा वरिष्ठ सदस्य हैं। इनकी सलाह अमूल्य होती है। अगर आप इनकी बात को ध्यान से सुनें और समझ पाएं तो आप को काफ़ी लाभ होगा। सादर।।
Comment by Samar kabeer on January 19, 2017 at 2:48pm
"मेरे ग़म मुझ पर हावी हो रहे हैं"इस जुमले में 'मेरे'और 'हैं'शब्द से ये बहुवचन हो रहा है ।
"पुराने दोस्त चले आओ'ये जुमला 'चले आओ'से ग़लत हो रहा है,अगर इसे तरह कहेंगे तो दुरुस्त होगा "पुराने दोस्त चले आएं"और अगर एक वचन में कहेंगे तो "पुराने दोस्त चला आ"कहना होगा ।
आपके मिसरे में "पुराने ग़म चले आओ"ग़लत है,या यूँ कहना होगा "पुराने ग़म चला आ"या बहुवचन में कहना है तो यूँ कहेंगे "पुराने ग़म चले आएं",उम्मीद है आप मेरी बात समझ गए होंगे ?
Comment by दीपक कुमार on January 19, 2017 at 10:58am

आदरणीय मिथिलेश वामनकर जी बहुत-बहुत शुक्रिया आपका ! आदरणीय समर कबीर जी की बात पर और आपकी बात पर भी मैं गौर करूँगा !

अखड़े को अखरे और पिंजड़े को पिंजरे मैं कर लूँगा . आख़िर अमृता प्रीतम जी ने भी तो “पिंजर” ही लिखा है। आभार !

Comment by दीपक कुमार on January 19, 2017 at 10:54am

आदरणीय समर कबीर साहब बहुत-बहुत आभार ! आपके सुझाव मेरी रचनाशीलता के क्रम में बहुत काम आएंगे ।

यहाँ पर मुझे एक बात समझ नहीं आ रही है कि “ग़म” एकवचन है तो बदलना क्यूँ पड़ेगा ? और “ग़म” तो एकवचन और बहुवचन दोनों तरह से प्रयोग किए जाते हैं । जैसे “मेरे ग़म मुझ पर हावी हो रहे हैं”, यहाँ ग़म बहुवचन के रूप में प्रयोग हो रहा है। यहाँ मेरे शेर के मिसरे में “पुराने ग़म चले आओ” में क्या ग़म एकवचन और बहुवचन दोनों नहीं माने जा सकते ? अगर ग़म एकवचन मानें तो किसी ख़ास ग़म की बात हो रही हो जैसे किसी ख़ास दोस्त की बात होती है “पुराने दोस्त चले आओ”। सादर !

Comment by दीपक कुमार on January 19, 2017 at 10:34am

आदरणीय सुशील सरना जी बहुत – बहुत धन्यवाद आपका !

Comment by दीपक कुमार on January 19, 2017 at 10:33am

Sheikh Shahzad Usmani साहब, ममनून हूँ, शुक्रगुजार हूँ आपका ! बहुत – बहुत शुक्रिया !

Comment by Sheikh Shahzad Usmani on January 17, 2017 at 7:47pm
छोटी बह्र पर बेहतरीन ग़ज़ल के लिए बहुत बहुत मुबारकबाद मोहतरम जनाब दीपक कुमार साहब।
Comment by Sushil Sarna on January 17, 2017 at 5:56pm
आदरणीय दीपक जी इस सुंदर ग़ज़ल के लिए हार्दिक बधाई।
Comment by Samar kabeer on January 17, 2017 at 3:56pm
जनाब दीपक कुमार जी आदाब,ग़ज़ल आपने अच्छी कही, इस प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार करें ।
मतले के सानी मिसरे में 'ग़म'एक वचन है, देखियेगा,इसलिये ये मिसरा बदलना होगा ।
तीसरे शैर के ऊला में 'अखड़े'को "अखरे" कर लें ।

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