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लेकिन आगे कैसे बढ़ लें? - (गीत) - मिथिलेश वामनकर

नई नई कुछ परिभाषाएँ, राष्ट्र-प्रेम की आओ गढ़ लें।

लेकिन आगे कैसे बढ़ लें?

 

मातृभूमि के प्रति श्रद्धा हो, यह परिभाषा है अतीत की।

महिमामंडन, मौन समर्थन परिभाषा है नई रीत की।

अनुचित, दूषित जैसे भी हों निर्णय, बस सम्मान करें सब।

हम भारत के  धीर-पुरुष हैं,  कष्ट सहें, यशगान करें सब।

चित्र वीभत्स मिले जो कोई,

स्वर्ण फ्रेम उस पर भी मढ़ लें।

 

मर्यादा के पृष्ट खोलकर, अंकित करते भ्रम का लेखा।

राष्ट्रवाद का कोरा डंका, निज स्वार्थों से पूरित देखा।

दुष्प्रचार की क्रीड़ा करते, जन-धन को न्योछावर कर दें।

जन-जन के वें अंतर्मन में,  सोच समझ कुछ ऐसी भर दें।

कष्ट लिखा हो जिन पन्नों पर,

उनको भी सुखदायी पढ़ लें।

 

प्रश्न करे जब लोकतंत्र का, उत्तर देकर वह  छलता है।

नवल भूमिका देखी छवि की, खेल धारणा का चलता है।

हाथी के पीछे छिपकर वें,चींटी को विकराल बताते।

शासक हैं या उड़ते पक्षी, अद्भुत सी बातें सिखलाते।

वृक्ष खड़े हैं नदिया तीरे,

उल्टी धारा हो तो चढ़ लें।

 

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(मौलिक व अप्रकाशित)  © मिथिलेश वामनकर 
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Comment by नाथ सोनांचली on January 1, 2017 at 1:09pm
आदरणीय मिथिलेश वामनकर जी सादर अभिवादन।

महिमामंडन, मौन समर्थन परिभाषा है नई रीत की।

मर्यादा के पृष्ट खोलकर, अंकित करते भ्रम का लेखा।
राष्ट्रवाद का कोरा डंका, निज स्वार्थों से पूरित देखा।
दुष्प्रचार की क्रीड़ा करते, जन-धन को न्योछावर कर दें।
जन-जन के वें अंतर्मन में, सोच समझ कुछ ऐसी भर दें।

क्या खूब लिखा है सर जी, नमन आपको, कई बार पढ़ा, फिर भी मन नहीं भरा, इतना बढ़िया आपने लिखा है की मेरे पासप्रसंशा के लिए शब्द नहीं , आपको इस उत्तम उम्दा सृजन के लिए दिल खोल कर बधाई
नव वर्ष की हार्दिक बधाईयाँ और अनन्त शुभकानाएँ
Comment by TEJ VEER SINGH on December 31, 2016 at 12:03pm

हार्दिक बधाई आदरणीय मिथिलेश जी। आज के परिवेश में माहौल की उष्णता को सार्थक करती बेहतरीन प्रस्तुति।एक एक शब्द अंगारा  और हर पंक्ति हृदय को झकझोरती हुई।पुनः बधाई।

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on December 30, 2016 at 11:00pm

सोलह सोलह है मात्राएँ

गीत ध्वजा  ले तू भी बढ़ ले

नई नई कुछ परिभाषाएँ,

राष्ट्र-प्रेम की आओ गढ़ लें।-------------------- सादर

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