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दिल के रिश्तों की बगिया में जब भी पतझड़ आता है.
ठूँठ बनी उम्मीदों में विश्वास छुपा मुस्काता है...

दिल को तो पतझड़ में भी
जाने क्यों सावन याद रहे,
दिल कोई तिनका है क्या
जो हालातों के साथ बहे?
सावन इसने अपनाया,ये पतझड़ भी अपनाता है...
ठूँठ बनी उम्मीदों में विश्वास छुपा मुस्काता है...

बागबान बन कर जिसने
रिश्तों की हर डाली सींचीं,
वो पागल क्या समझेगा
क्यों सावन ने बाँहें खींचीं?
इंतज़ार में सावन के वो फिर-फिर पलक बिछाता है...
ठूँठ बनी उम्मीदों में विश्वास छुपा मुस्काता है...

जाते-जाते खुशियों के फूलों
ने जब दामन छोड़ा,
तन-मन ने यादों की मिट्टीे
से अपना नाता जोड़ा,
कतरा-कतरा दिल सौंधी यादों का इत्र लगाता है...
ठूँठ बनी उम्मीदों में विश्वास छुपा मुस्काता है...

निश्छल भावों का दरिया
फिर कोंपल नई खिलाएगा,
जल्दी रूखे दिन बीतेंगे
सावन फिर से आएगा,
मन ही मन दिल मगन-मगन अलमस्त मल्हार सुनाता है...
ठूँठ बनी उम्मीदों में विश्वास छुपा मुस्काता है...

मौलिक और अप्रकाशित

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Comment by narendrasinh chauhan on December 23, 2016 at 5:46pm

आदरणीय, खूब सुन्दर रचना

Comment by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on December 22, 2016 at 9:37am

ठूँठ बनी उम्मीदों में विश्वास छुपा मुस्काता है... - पतझड़ में भी सावन का अहसास कराती मन की हर्षित बगिया एक विश्वास जगती है |

मनोहारी गीत रचना के लिए हार्दिक बधाई बहन डॉ. प्राची सिंह जी 

Comment by नाथ सोनांचली on December 21, 2016 at 4:07am
आद0 डॉ प्राची सिंह जी सादर अभिवादन,क्या उम्दा गीत पढने को मिली, वाकई गजब। प्रशंशा में शब्द कम है। आपको कोटिश बधाइयाँ

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on December 21, 2016 at 1:11am

आदरणीया डॉ. प्राची सिंह जी, आपने पतझड़ और सावन के बहाने दिल की बात सुनाता बहुत सुन्दर गीत लिखा है-

निश्छल भावों का दरिया
फिर कोंपल नई खिलाएगा,
जल्दी रूखे दिन बीतेंगे
सावन फिर से आएगा,
मन ही मन दिल मगन-मगन अलमस्त मल्हार सुनाता है...
ठूँठ बनी उम्मीदों में विश्वास छुपा मुस्काता है.................................... इस आशा जगाती पंक्तियों ने मुग्ध कर दिया. 

इस शानदार गीत की प्रस्तुति पर हार्दिक बधाई निवेदित है सादर 

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